Tuesday, October 13, 2020

साईलीला बोधामृत # 14 साईबाबा की पञ्चमहाभूतों पर सत्ता

 एक बार शिर्डी मे सूर्यास्त के बाद घनघोर बादल छा जाते है. पूरा आसमान काला हो जात है.बादलो की भयंकर गर्जनाए सुनाई देने लगती है. झंझावात वायु बहने लगती है. बिजलीया कड़कने लगती है.

आसमान से ओले गिरने लगते है. ग्रामस्थ, पशु-पक्षी और मवेशी सभी भयग्रस्त हो जाते है. इसके बाद मुसलाधार वर्षा भी होने लगती है. चारों और पानी ही पानी हो जाता है. खलिहानों में रखा अनाज गीला हो जाता है.  पशुओ के लिए रखे चारे के ढेर के ढेर पानी में बह जाते है.

गरीब और निराश्रित लोग और अन्य ग्रामस्थ लोग सब द्वारकामाई में शरण लेने आते है.

शिर्डी के कुछ लोग अनेक छोटे और बड़े देवताओ से मन्नत माँगते है, पर किसी भी देवता से कोई भी राहत नहीं मिलती है.

फिर शिर्डी के रहिवासी  इस संकट से बचने के लिए साईबाबा से गुहार लगाते है. साईबाबा को न तो कोई चढ़ावा चढ़ाना पड़ता था न कोई यज्ञयाग या पशुबलि जैसा कर्मकांड लगता था. साईबाबा तो केवल भाव के भूखे थे, केवल निवेदन से हो लोगो के संकट हर लेते थे.

लोगो को ऐसा भयभीत देखकर साईबाबा बहुत ही व्यथित हो जाते है. साईबाबा अपनी गद्दी छोड़कर द्वारकामाई के प्रवेश द्वार से बाहर बारिश में निकल आते है. उनके ऊपर बदल गरज रहे होते है, बिजलीया कड़कती रहती है.

साईबाबा जोर-जोर से गर्जना करते है. वातावरण में उनका नाद गूंजने लगता है. उनके स्वर से द्वारकामाई मानों`कम्पित होने लगती है. आखिर बाबा की इस गर्जना से बारिश धीरे-धीरे कम होने लगती है.

बवंडर जैसी हवाये रुक जाती है, बादल छट जाते है और चंद्रम और तारे दिखने लगते है. सभी लोग अपने-अपने घरो को जाते है, पशु-पक्षी भी निर्भय हो जाते है. शिर्डी पर आया दैवीय संकट साईबाबा की कृपा से टल जाता है.

ऐसी ही एक अन्य घटना है. एक बार दोपहर के समय द्वारकामई मे धुनी की आग एकदम से भडक कर छ को छुने लगती है. लोगो को लगता है कि द्वारकामाई कर भस्म हो जएगी.

सभी लोग चिंताग्रस्त होते है, पर बाबा निश्चिंत बैठे रहते है. कोई धुनी मे पानी डालने का सुझाव देता है पर साईबाबा के भय से कोई ऐसा कर नही पाता है.

आखिर में साईबाब अपना सटका (बड़ा डंडा) उठकर एक तख्त पार मरते हुवे कहते है :-“ पीछे हट ..”. फिर धुनी के पास के एक खम्बे पर “सबूर सबूर” कहते हुवे के का प्रहार करने लगते है.अग्नि की ज्वाला धीरे-धीरे शांत हो जाती है.

साईबाबा की पांच महाभूतो पर सत्ता थी.  ये दोनों प्रसंग साईसच्चरित के 11 वे अध्याय मे आये है, जो इस अध्याय का पाठ करेगा सकी आपदा का निरसन होगा. ऐसा साईसच्चरित मे स्पष्ट उल्लेख हैं.

साईसच्चरित के रचनाकार हेमाडपंतजी आगे कहते है:- “ जो भक्त शुद्ध ह्रदय से नियमनिष्ठ होकर साईबाबा की भक्ति करेगा उसकी सारी कामनाये पूरी होकर अंत में निष्काम होकर वह सायुज्य मुक्ति को प्राप्त होगा.

साईलीला बोधामृत # 13 सच्ची भावना भगवान तक पहुचती ही है

 बांद्रा के रघुवीर भास्कर पुरंदरे अपने परिवार के साथ शिर्डी के लिए प्रस्थान करते है. प्रस्थान से पहले उनकी धर्मपत्नी  को श्रीमती तर्खड २ बड़े बैंगन देते हुवे बड़ी श्रद्धा से कहती है कि एक बैंगन का भुर्ता और दुसर बैंगन से काचऱ्या ( बैंगन को गोल और पतला काटकर ऊपर मसाला लगाकर तवे पर तेल में सेकना ) बनाकर साईबाबा को भोग लगाइये.  “ठीक है..”, ऐसा कहकर श्रीमती पुरंदरे वे बैंगन ले लेती है.

शिर्डी पहुचकर श्रीमती पुरंदरे एक बैंगन का भुर्ता बनाती है. दूसरा बैंगन वह काचऱ्या बनाने के लिए काटती है.  फिर “अगले दर्शन के समय काचऱ्या साईबाबा को देंगे”,  ऐसा सोच कर वह उस कटे हुवे बैंगन को वैसा ही छोड़ देती है. आरती के बाद सईबाबा को भुर्ते का भोग लगकर, श्रीमती पुरंदरे थाली वही छोडकर चली आती है. साईबाबा सभी लोगो के नेवैद्य को साथ लेकर भोजन करने बैठते है. साईबाबा बैंगन के भुरते को चाव से खाते है. सभी लोगो को लगता है कि बाबा को भुर्ता रुचिकर लगा है.

अचानक साईबाबा कहते है कि उन्हे बैंगन की काचऱ्या खने का मन हो रहा है. साईबाबा का भोजन रुक जाता है.  पर बैंगन कहा से मिते, उस समय शिर्डी में बैंगन आना शुरू नहीं हुवे थे.

श्रीमती पुरंदरे के नेवैद्य में भुर्ता था, इसलिए, उनके पास बैंगन हो सकते है, ऐसा सोचकर भक्तलोग उनके पास आते है. तब जाकर सब को पता चलता है कि साईबाबा का मन काचऱ्या पर क्यों गया था.

साईबाबा षडरस अन्न के स्वाद से ऊपर उठ चुके थे पर श्रीमती तर्खड की श्रद्धा से बाबा को काचऱ्या खिलाने की भावना को वे किस तरह अनदेखा कर सकते थे ?

सन १९१५ के डिसेम्बर के महीने में साईभक्त  बाळाराम मानकर के निधन के बाद उनके पुत्र गोविन्द को उनका और्ध्वदेहिक करने शिर्डी जाना था. वह शिर्डी जाने से पहले तर्खडजी के घर यह बात जताने आता है. उस समय गोविन्द बहुत ही जल्दी में था. श्रीमती तर्खड के घर में साईबाबा को देने के लिए सिर्फ एक बचा हुवा पेढ़ा ही था. बाहर से कुछ प्रसाद लाने के लिये समय भी नही था. वे वही पेढ़ा गोविन्द को दे देती है.

गोविन्द पेढ़ा लेकर चला जाता है. शिर्डी मे अपने पिता के और्ध्वदेहिक करने के बाद वह जब पहली बार साईबाबा के दर्शन को जाता है तब वह उस पेढे को अपने  रहवासस्थल पर भूल जाता है. उस समय बाबा  कुछ नही कहते है.

तिसरे प्रहर मे गोविन्द फिर बाबा के दर्शन को जाता है, इस समय भी वह पेढा ले जाना भूल जाता है.

बार साईबाबा पुछते है कि तुम्ह मेरे लिए क्या लाये हो ?

गोविंद के दिमाग से पेढे की बात मानो निकल ही जाती है. वह कुछ नहीं”, ऐसा उत्तर देता है. साईबाबा उसे श्रीमती तर्खड  द्वारा दिये हुवे पेढे का स्मरण कराते है. तब गोविन्द थोडा सकुचाकर वह पेढ़ा ला देता है. साईबाबा अत्यंत प्रेम से उस पेढ़े का स्वीकार करते है.

साईबाबा के सामने रोज मिठाई और पकवानों  को ढेर पडता था पर श्रीमती तर्खड की अनन्य भावना के साथ भेजे हुवे उस पेढ़े को कैसे अनदेखा कर सकते थे ?

पेढा लाने वाला गोविंद सूतक मे था इसके बावजूद साईबाबा अत्यंत प्रेम से पेढे का स्वीकार करते है.

भगवान राम ने भी शबरी के अनन्य भक्तिभाव को देखकर ही उसके झूठे बेर खाए थे. तात्पर्य यही है कि अगर भक्त की भावना सच्ची है तो वह ईश्वर तक अवश्य ही पहुचती है.

साईलीला बोधामृत # 12 भगवान कैसे प्रसन्न होते है ?

 दोपहर का वक्त था. शिर्डी में रहते हुवे श्रीमती तर्खड भोजन परोसने के लिए थालिया लगाती है. तभी उनके दरवाजे के पास एक भूखा श्वान (कुत्ता )आ जाता है. श्रीमती तर्खड उस श्वान को थाली में परोसी भाकरी (मोटे अनाज से बनी रोटी ) का एक-चौथाई हिस्सा दे देती है. उसके बाद वहां एक कीचड़ से सना शूकर आता है, श्रीमती तर्खड उसे भी भाकरी खिला देती है.

यह साधारण सी बात श्रीमती तर्खड के ध्यान से उतर जाती है. भोजन करने के बाद श्रीमती तर्खड जब द्वारकामाई जाती है तब साईबाबा स्वयं होकर श्रीमती तर्खड से कहते है:-“ माई, आज आपने मुझे पेटभर भोजन करा दिया. भूख से मेरे प्राण व्याकुल हो गए थे पर आपने भोजन देकर मुझे तृप्त कर दिया. आगे भी हमेशा ऐसे ही मुझ पर कृपा करना. यही कार्य आपके काम आएगा. इस द्वारकामाई मस्जिद में बैठकर मैं सत्य वचन कह रहा हुँ. पहले भूखों को भोजन दो फिर स्वयं भोजन ग्रहण करो. इस बात को सदैव ध्यान में रखना.”

यह बात श्रीमती तर्खड को समझ में नहीं आती है, पर वह जानती थी कि साईबाबा की वाणी तो कभी निरर्थक हो ही नहीं सकती है.

वे कहती है:- “ बाबा, यहाँ शिर्डी में तो हम परतंत्र से है. पैसो से भोजन का क्रय करते है. जिस दिन जो भोजन मिलता है, वही हम ग्रहण करते है.”

इस पर साईबाबा कहते है:- “प्रेम की वह भाकर खाकर मैं तृप्त हो गया हुँ, मुझे अभी भी डकार आ रही है. भोजन करने से पहले आपने जिन श्वान और शूकर को भोजन दिया, उनसे मेरी एकात्मता है.”

यह सुनकर श्रीमती तर्खड आश्चर्य चकित रह जाती है.

साईबाबा आगे कहते है:- “ श्वान, शूकर, गाय, बिल्ली, चींटी, मक्खी,जलचर इत्यादि प्राणियों में मैं ही विचरण कर रहा हुँ.  जो सभी जीवो में मुझे देखेगा वही मेरे प्रेम को प्राप्त होगा. आप भेदबुद्धि  का त्याग कर ऐसे ही मुझे भजा करो.”

 

ठीक यही बात गीताजी में भी कही गई है कि भगवान सभी जीवो के ह्रदय में रहते है. (अध्याय १८ श्लोक ६१ )

उस समय साईबाबा के मुख से परब्रह्म ही बोल रहा था, ठीक उसी तरह जिस तरह भगवान श्रीकृष्ण के मुख से गीता कही गई थी.

यज्ञ क्या होताहै ? अग्नि जो कि देवतओं का मुख है,उसमें आहुतियों का डालना ! अगर हम किसी भूखे जीव चाहे वह मनुष्य हो या पशु या फिर पक्षी को अगर अन्न या जल देते है तो वह यज्ञ ही होगा. क्योंकि तब हम उसकी जठराग्नि में आहुतियाँ डाल रहे होते है.

भगवान स्वयं जीवो में जठराग्नि के रूप में रहता है (गीताजी अध्याय १५ श्लोक १४)

कलियुग में जब अनेक मनुष्य, गोमाता व अन्य पशु-पक्षी सभी अपनी क्षुधाग्नि से जलते हुवे दर-दर ठोकरें खा रहे है, उस समय अन्नदानरूपी यज्ञ का करना ही श्रेष्ठतम होगा और इसी से परमात्मा प्रसन्न होंगे.

साईलीला बोधामृत # 11 साईबाबा का सूक्ष्म देह से अपने भक्तों के घर जाना

 बाबासाहेब तर्खड एक मिल में उच्च अधिकारी थे. उनकी तरह उनका पुत्र भी अनन्य साईभक्त था. वह रोज सुबह उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर काया, वाचा और मन से साईभक्ति करता था. साईबाबा को नेवैद्य अर्पित किये बिना तो वह भोजन तक नहीं करता था. बाबासाहेब की पत्नी भी साईबाबा की परम भक्त थी. एक बार धर्मपत्नी की इच्छा शिर्डी जाने की होती है. बाबासाहेब चाहते थे कि उनका पुत्र भी उसकी माता के साथ शिर्डी जाये ताकि उसकी माताजी की यात्रा में देखरेख हो सके और यात्रा भी सुगमता से परिपूर्ण हो जाए. लेकिन तर्खडजी का पुत्र घर छोड़कर कही भी जाने को तैयार नहीं था, क्योंकि इससे उसके साईबाबा को नित्य नेवैद्य अर्पण करने के नियम में खंड पड़ता.

तर्खडजी प्रार्थना समाज के सदस्य थे. प्रार्थनासमाज ईश्वर की निर्गुण भक्ति पर जोर देता था और प्रार्थना समाज मूर्तिपूजा या तस्वीर के पूजन को सही नहीं मानता था. इसीलिए तर्खडजी का पुत्र अपने पिता को साईबाबा को नेवैद्य अर्पित करने के बारे में कैसे कह सकता था ?

पर साईबाबा के प्रति भक्तिभाव के चलते तर्खडजी साईबाबा के चित्र को नेवैद्य अर्पित करने की  जवाबदारी उठा लेते है. ‘साईबाबा को नेवैद्य अर्पण किये बिना घर में कोई भी अन्नग्रहण नहीं करेगा’- ऐसा अभिवचन भी देते है.

इससे उनका पुत्र संतुष्ट होकर अपनी माता के साथ शिर्डी के लिए प्रस्थान कर देता  है. तर्खडजी  को प्रतिदिन मिल में सुबह-सुबह जाना पडता था.

तर्खडजी प्रतिदिन प्रातकाल में साईबाबा का पूजन करके नेवैद्य अर्पण करते थे. मिल से लौटकर वे साईबाबा को अर्पित शक्कर के नेवैद्य से अन्नशुद्धि कर के भोजन ग्रहण करते थे. कुछ दिनों तक यह क्रम निर्बाध रूप से चलता है. पर एक दिन मिल से लौटकर भोजन करते समय जब उनकी रोटीवाली बाई ने थाली में शक्कर नहीं रखी, तब उन्हें यह ध्यान होता है कि वे आज साईबाबा को नेवैद्य अर्पित करना भूल गए है.

तर्खडजी का मन अनुताप से भर जाता है. वे साईबाबा के चित्र को सजल नेत्रों से दंडवत करके अपने सेवापराध की क्षमा माँगते है. साथ ही वे अपने हातों से घटित इस सेवापराध का उल्लेख करते हुवे शिर्डी में अपने पुत्र को एक पत्र लिखते है. वे उस पत्र में अपने पुत्र को साईबाबा से उनके अपराध को क्षमा करने की प्रार्थना करने को कहते है.

यह घटना बांद्रा में घटी थी जो कि शिर्डी से तकरीबन २५० किलोमीटर की दुरी पर है. उसी समय शिर्डी में उनका पुत्र और धर्मपत्नी, द्वारकामाई में आकर साईबाबा के चरणों का वंदन करते है.

तब साईबाबा श्रीमती तर्खड से कहते है:- “ माँ.., मैं आज भी प्रतिदिन की तरह बांद्रा गया था. वहां किवाड़ बंद थे, फिर भी मै अन्दर चला गया, पर मुझे वहां नेवैद्य नहीं मिला और भूखा ही भरी दोपहरी में लौटना पड़ा .”

यह सुनते ही तर्खडजी के पुत्र की समझ में आ जाता है कि जरुर उनके पिता के द्वारा नेवैद्य अर्पित करने में कोई त्रुटी हुई है. इस पूरी घटना का उल्लेख करते हुवे तर्खडजी का पुत्र अपने पिता को बान्द्रा में पत्र भेजता है. यह पत्र पढ़कर तर्खडजी के नेत्र सजल हो जाते है.

उधर बांद्रा से भेजा हुवा उनका पत्र भी उनके परिवार को मिलता है. तर्खडजी का पुत्र साईबाबा की सर्वज्ञता और सर्वसत्ता के आगे नतमस्तक हो जाता है. साईबाबा स्थूलदेह से शिर्डी में होने पर भी पुरे विश्व में कही भी उनकी सूक्ष्म देह के द्वारा आ-जा सकते थे.

इसीलिए साईबाबा के चमत्कारों का अनुभव शिर्डी के बाहर भी उनके भक्तों को होता रहता था. आज भी साईबाबा अपनी सूक्ष्मदेह से उनके भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते रहते है. साईबाबा की कृपा केवल शिर्डी में ही नहीं वरन इस धरा पर कही पर भी प्राप्त की जा सकती है, केवल ह्रदय में उत्कट साईभक्ति होनी चाहिए.

साईलीला बोधामृत # 10 भक्तो के संकट स्वयं पर लेने वाले साईबाबा

 सन १९१० का धनतेरस का दिन था. साईबाबा धुनी के पास बैठकर लकडिया जला रहे थे. धुनी भी तीव्रता से जल रही थी. अचानक साईबाबा अपने दोनों हात धुनी में डालकर निश्चित रूप से बैठे रहते है. उस समय उनकी सेवा में रत माधवराव देशपांडेजी की दृष्टि अचानक साईबाबा की इस कृति पर पड़ती है. माधवराव साईबाबा की कमर को दोनों हात से पकड़ते हुवे उन्हें पीछे खीच लेते है. उन्हें धुनी से दूर करकर देशपांडेजी पूछते है:-“अरे भगवान ! आपने ये क्या कर दिया ? ”

इस पर साईबाबा उत्तर देते है:-“ अरे, एक भक्त लोहार की पत्नी अपने कंधे पर अपनी छोटी सी बेटी को लेकर भट्टी में चमड़े के भाते से हवा कर रही थी. अचानक उसके पति के एकदम रोबीली आवाज में  बुलाने पर वह भय से एकदम उठ खड़ी होती है. खड़े होते समय बच्ची कंधे पर है, यह बात उसके ध्यान में ही नहीं रहती है. वह बच्ची एकदम से छिटककर धधकती हुई भट्टी में गिर जाती है.अच्छा हुवा कि मेरे हात जल गए पर उस बिटिया के प्राण बच गए.”

इसीलिए अंतर्यामी साईबाबा को जैसे ही इस भयंकर घटना का ज्ञान होता है वे  जलती धुनी में अपने दोनों हात डाल देते है. साईबाबा के दोनों हात बुरी तरह से जल जाते है पर उधर उस बच्ची को भट्टी से बाहर निकालने पर उसके शरीर पर जलने का नामोनिशान तक नहीं मिलता है.

साईबाबा गरीबो में बांटने के लिए खिचड़ी बनवाते थे. बड़ी सी सिगड़ी में खौलती हुई खिचड़ी को किसी कड़छी से चलाने की जगह वे अपने दाहिने हात की आस्तीन को बाजु तक चढाकर चलाते थे. भक्तो को अपने करकमल का कृपाप्रसाद मिले इस दृष्टि से किये गए इस कृत्य में साईबाबा का हात बिलकुल भी नहीं जलता था. लेकिन उस दिन धुनी में अपने हातों को डालने से साईबाबाके हात बुरी तरह जल जाते है. उस लोहार भक्त की बच्ची के ऊपर आया हुवा अग्नि का संकट बाबा खुद भोगकर उसका रक्षण करते है. सच्चे सद्गुरु ऐसे ही होते है.

साईलीला बोधामृत # ९ बाबा का नाम साईं कैसे पड़ा ?

 शिर्डी के लोगों को अपने गुरु के समाधि स्थान के बारे में बताने के बाद वह बालक शिर्डी से गुप्त हो जाता है. इस समय तक लोग बाल साईं को बालक ही कहते थे, उनका नाम किसी को भी मालूम नहीं था.

कुछ वर्षो के बाद धूप गाँव के अधिकारी चाँद पाटिल किसी से कार्य से औरंगाबाद आते है. वहां उनकी घोड़ी गुम हो जाती है. दो महीने तक खोज करने के बाद भी जब घोड़ी का कोई पता नहीं चलता है तब निराश चाँद पाटिल अपने गाँव की और लौटते है. साढ़े चार कोस चलने बाद उन्हें एक किशोर फ़क़ीर आम के वृक्ष के नीचे बैठे हुवे मिलता है. सर पर टोपी, बदन में  कफनी , बगल में सटका और हातों में तमाखू भरी हुई चिलीम.

किशोर फ़क़ीर चाँद पाटिल को सुस्ताने के लिए कहते है और उनकी उदासी का कारण जानकर उत्तर देते है :-“चाँद..., तुम्हारी घोड़ी को नाले के पास खोजो.”

और आश्चर्य देखिये, दो महीने से खोई हुई घोड़ी चाँद पाटिल को मिल जाती है.

इसके बाद वह फ़कीर अपने चिमटे को जमीन में मारकर वहां अग्नि प्रगट कर देते है. उसी अग्नि से चिलीम जलती है. इसके बाद वह किशोर फ़कीर जमीन में सटका मारकर पानी निकाल देता है.

पञ्च-महाभूतों में से दो पर उस किशोर फ़कीर का अधिकार देखकर चाँद पाटिल समझ जाते है कि यह फ़कीर कोई साधारण न होकर एक आध्यात्मिक अधिकार से संपन्न हस्ती है.

चाँदभाई उस  फ़कीर को अपने घर आमंत्रित करते है. फ़कीर भी उसका आमंत्रण स्वीकार कर लेते है.

कुछ दिनों के बाद चाँद पाटिल की पत्नी के भतीजे का विवाह शिर्डी गाँव में तय होता है. चाँद भाई उस युवा फ़कीर को भी बारात में आने का निमंत्रण देते है. इसके बाद वह किशोर फ़कीर भी बारात के साथ शिर्डी में आता हैं.

शिर्डी में भगवान खंडोबा के मंदिर के पुजारी म्हाळसापति उन्हें देखते ही मुग्ध से हो जाते है और अत्यंत आदरपूर्वक उनके मुख से दो शब्द निकलते है:- “ या.. साई “  अर्थात आइये साई “. घटना के बाद से ही लोग उन्हे साई इस नाम से संबोधित करने लगते है.

साईलीला बोधामृत # 8 साईंबाबा को नीम का वृक्ष क्यों प्रिय था ?

 शिर्डी में नाना चोपदार नामक एक व्यक्ति की माँ ने साईंबाबा को किशोरावस्था में देखा था. उनके अनुसार वह बालक गौरवर्ण के होकर अत्यंत सुन्दर थे. वे नीम के वृक्ष के नीचे सर्दी-गर्मी आदि द्वंदों को सहते हुवे  ध्यानस्थ अवस्था में बैठा करते थे. दिन में वे किसी से भी बाते नहीं करते थे, रात में उन्हें किसी का भी भय नहीं रहता था.

वे दिन-रात सदा नीम के वृक्ष के सान्निध्य में ही रहा करते थे. इतनी अल्पायु में ऐसी घोर साधना करने वाले बालक को देखकर शिर्डी के रहिवासी आश्चर्य किया करते थे.

शिर्डी में जब भगवान खंडोबा का संचार कुछ लोगो में हो रहा था, तब शिर्डीवासियो ने भगवान खंडोबा से  उस बालक के सम्बन्ध में अनेक प्रश्न किये.

“यह बालक कहा से आया है ?”

“ किस भाग्यवान का यह पुत्र है ?”

इस पर भगवान खंडोबा लोगो को उस नीम के वृक्ष के नीचे एक विशिष्ट स्थान पर खुदाई करने को कहते है.

खुदाई में ईटो का ढेर मिलता है, उसे हटाने पर एक सुरंग मिलाती है. उस सुरंग में आगे जाने पर चार समई (महाराष्ट्रियन पद्धति का पीतल का दीपस्तंभ ) जलती हुई मिलती है. वहाँ गोमुखी, एक लकड़ी का पटा और माला भी दृष्टिगोचर होती है.

भगवान खंडोबा कहते है इस बालक ने यहाँ 12 वर्षो तक मौन रहकर तपस्या की है. यह सब ज्ञात होने पर लोग साईबाबा से खोद-खोदकर इस बारे में प्रश्न करते है.

इस पर साईबाबा उस स्थान को अपने गुरु का अत्यंत पवित्र समाधि-स्थान बताते है. बाद में साईंबाबा की अनुज्ञा से उस स्थान को ईटे लगाकर फिर से बंद कर दिया जाता है.

बाद में साठेजी नीम के वृक्ष और समाधि-स्थल सहित आसपास की भूमि खरीद लेते है. वे नीम के वृक्ष के चारो और चबूतरा बना देते है . साठेजी उस भूमि पर कर एक बाड़ा  भी बना देते है, जहाँ दर्शनार्थी ठहरा करते थे.

गुरुवार और शुक्रवार को सूर्यास्त के बाद समाधि-स्थान के सामने जो व्यक्ति उद (लोबान) जलाएगा, उसे भगवान श्रीहरि सदा सुखी रखेगा. यह साईबाबा के मुख से निकला हुवा वचन है.

साईलीला बोधामृत # 7 साईंबाबा अंतर्यामी थे

 काकासाहेब दीक्षित प्रतिदिन स्नानादि से निवृत्त होकर आसनस्थ होकर ईश्वर का ध्यान किया करते थे. एक दिन उन्हें ध्यान में विट्ठल भगवान के दर्शन होते है. उस दिन काका साहेब जैसे ही साईबाबा के दर्शन करने जाते है, साईबाबा उनके बिना कुछ कहे ही कहते है :-“ विट्ठल पाटिल आये थे ना ! भेट हो गयी उनसे ? वे बहुत ही भगोड़े है. रस्सी से बांध कर उन्हें उन्हें वश में कर लो. एक क्षण के लिए भी अगर ध्यान हटा तो वे आँखों से ओझल हो जाते है.”

साईंबाबा दीक्षितजी को भगवान को भक्ति की डोर से बांधने को कह रहे थे. भक्त का ध्यान जरा सा भी भगवान से हटकर संसार में चला जाताहै तो तो भगवान भक्त से दूर हो जाते है.  गोपियों जैसी अनन्य भक्तों को भी ऐसे ही कुछ अनुभव आये थे. वे भगवान श्रीकृष्ण को छलिया, निर्मोही इत्यादि शब्दों से संबोधित किया करती थी. इसीलिए, सभी संत अपने भक्तो से सदैव नामस्मरण रूपी भक्ति करने का आग्रह करते है.

उसी दिन काका साहेब की दृष्टि एक शिर्डी में आये परदेसी व्यक्ति पर पड़ती है. वह  व्यक्ति भगवान विट्ठल की तस्वीरे बेच रहा था. आश्चर्य की बात तो यह थी कि उन चित्रों में भगवान विट्ठल की छवि एकदम वैसी ही थी जैसी उनके ध्यान में आई थी.

दीक्षितजी प्रतिफल देकर एक चित्र खरीद लेते है और अपने पूजनकक्ष में उसे लगाकर भक्ति भाव से प्रतिदिन उसका पूजन करने लगते है.

आज भी जब साईबाबा अपना पञ्चभौतिक देह त्याग चुके है, तब भी वे अपने सुज्ञ भक्तों पर सदा अपनी दृष्टि बनाये रखते है और उनका सदैव रक्षण और मार्गदर्शन करते रहते है. अनेक साईं भक्तो को ऐसे अनुभव आते रहते है.

साईलीला बोधामृत # 6 साईबाबा का दासगणुजी को ईश्वर दर्शन कराना

 साईबाबा की ईश्वर के नामस्मरण पर बड़ी प्रीति थी. वे स्वयं “अल्लाह मालिक” ऐसा सतत नामस्मरण करते रहते थे. भगवद्गीता में जिस निर्गुण ईश्वर का ‘अव्यक्त’ ऐसा उल्लेख किया गया है, उसे ही कालांतर में सनातन धर्म से ही निकले एक धर्म में ‘अल्लाह’ कहा जाता है. भगवद्गीता के अनुसार सगुण ईश्वर के अपेक्षा निर्गुण या अव्यक्त ईश्वर की उपासना करना अत्यंत ही कठिण होता है और इसीलिए केवल उच्च कोटि के साधक या सिद्ध ही इस मार्ग को अपना सकते है. 

साईंबाबा उस निर्गुण ईश्वर का सतत नामस्मरण करते थे. साईबाबा धर्म को पिता के समान बताकर अपने सभी भक्तो को अपने-अपने धर्मो के अनुसार ईश्वरभक्ति करने का निर्देश देते थे. अगर कोई सामान्य व्यक्ति निर्गुणभक्ति करे तो उसे ईश्वर को प्राप्त करना बड़ा ही कष्टप्रद हो जाता है और इस राह में पाखंड और दाम्भिकता का भी भय बना रहता है. इसीलिए साईबाबा स्वयं तो सदैव निर्गुण भक्ति करते थे पर अपने सगुण भक्तो को सगुण भक्ति का ही मार्गदर्शन देते थे.

साईबाबा एक बार अपने शिष्य दासगणुजी को एक सप्ताह का नामस्मरण करने को कहते है. इस पर दासगणु जी प्रतिप्रश्न करते है कि क्या इससे भगवान विट्ठल प्रकट होंगे ? इस पर साईबाबा दासगणु जी के वक्षस्थल को स्पर्श करके उत्तर देते है कि अगर भक्त भावार्थी होगा तो विट्ठल जरुर प्रगट होगा.

डाकोर के रणछोड़ भगवान हो या पंढरपुर के विट्ठल भगवान, वही भगवान शिर्डी की इस द्वारकामाई में भी है. व्यर्थ में दूर जाने की क्या जरुरत है ? साईबाबा के कहने का गूढार्थ यह था कि ईश्वर तो हर जगह विद्यमान होता है उसे पाने के लिए केवल उत्कट भक्ति की आवश्यकता होती है. भक्त पुंडलिक कौनसा मंदिर में गया था ? वह तो घर पर ही अपने माता-पिता रूपी ईश्वर की सेवा-रूपी उपासना करता रहा और ईश्वर को स्वयं उसके समक्ष  प्रकट होना पड़ा. साईबाबा का वचन सत्य होता है, नामसप्ताह के सम्पूर्ण होते ही दासगणु महाराज को भगवान विट्ठल के दर्शन हो जाते है.

पर यहाँ प्रश्न यह उठता है कि नामसप्ताह तो अनेक भक्त करते है, पर उन्हें ईश्वर दर्शन क्यों नहीं होता है ?

भगवद्गीता के अनुसार सभी प्राणियों के ह्रदय में ईश्वर वास करता है. पर यह ईश्वर माया के प्रभाव से प्राणियों को सुप्त प्रतीत होता है. साईंबाबा दासगणु जी के ह्रदय को छूकर माया का प्रभाव हटा देते है और इसीलिए नामसप्ताह के समाप्त होते ही दासगणुजी को विट्ठल दर्शन हो जाते है. यही सद्गुरु कृपा का फल है.

साईलीला बोधामृत #5 साईबाबा प्रत्यक्ष ईश्वर के अवतार थे

 एक बार दासगणु महाराज को विशेष पर्व के समय प्रयाग संगम जाकर तीर्थ स्थान करने की इच्छा होती है. वे साईबाबा के पास जाकर तीर्थयात्रा  के लिए अनुज्ञा माँगते है.

साईबाबा कहते है:- “ इसके लिए इतने दूर जाने कि क्या आवश्यकता  है ? शिर्डी ही प्रयाग तीर्थ है, केवल आपका विश्वास दृढ़ होना चाहिए.”

इस बात पर दासगणु महाराज साईबाबा के चरणों में अपना सर रख देते है . देखते ही देखते  साईबाबा के पैरो के दोनों अंगूठो से दो जलधाराए बहने लगती है. दोनों जलधाराए मिलकर एक संगम बना देती है. इसी संगम के जल से आचमन और प्रोक्षण करके दासगणु महाराज धन्य हो जाते है.

यह चमत्कार देखकर दासगणु महाराज के चरणों से अश्रु की धाराए बहने लगती है. साईबाबा ने अपनी उक्ति को सार्थक कर के दिखाया था.

गंगाजी को भगवान विष्णु के चरणों से निकलने के कारण अत्यंत पवित्र माना जाता है, और यही गंगा जब यमुना जी से (जिसके तट पर भगवन श्रीकृष्ण ने अनेक लीलाए की थी) से मिलती है, उस संगम के महत्त्व का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता है.

उन दिनों में तीर्थयात्राए आज के दौर की तरह सुलभ न होकर अत्यंत ही कष्टप्रद थी. पर दासगणु महाराज साईबाबा कृपा से सहज ही उस संगम से लाभान्वित हो जाते है.

साईलीला बोधामृत # 4 सद्गुरु और दाम्भिक गुरु में अंतर

 “ शिष्यापराधे  गुरोर्दण्ड:  इस सूक्ति के अनुसार शिष्य द्वारा किये अपराध का दंड गुरु को मिलता है, ठीक उसी तरह जिस तरह अबोध बालक द्वारा की गई गलती के कारण उसकी माँ को उलाहना सुनना पड़ता है.  सद्गुरु भी अपने शिष्य के लिए माता के समान होते है और इसीलिए उन्हें माऊली भी कहा जाता है.

पूर्वजन्म कृतं पापं व्याधि रुपे पीडते इस शास्त्रवचन के अनुसार सभी जीवो को होने वाले रोग उनके पिछले जन्म के पापो के फलस्वरूप होते है. हर मनुष्य को ये पापो के फल भोगना ही पड़ते है पर जिन भक्तो के सद्गुरु होते है वो अकसर इन रोगरूपी पीड़ा से बच जाते है, लेकिन उनकी भक्ति भी निस्सीम होना चाहिए.

एक बार दादासाहेब खापर्डे के पुत्र को गाँव में आये ग्रंथि ज्वर के कारण जोरदार बुखार आ जाता है. ग्रंथिज्वर एक तरह का बुखार होता है, जिसमे जिसमे गर्दन, सीना या हातों की कांखो में बड़ी बेर या आंवले के बराबर गांठे हो जाती है, कभी-कभी तो इन गांठो की माला सी बन जाती है, इसलिए इसे कंठमाला या गण्डमाला भी कहा जाता है.

दादा साहेब की धर्मपत्नी घबरा जाती है और वह साईबाबा से अपने शहर अमरावती (महाराष्ट्र) जाने की अनुज्ञा मांगती है. इस पर साईबाबा उसे अत्यंत कोमल स्वर में उत्तर देते है :- “ घने बादल छाये हुवे है, जोरदार बारिश होगी और फिर आसमान साफ हो जाएगा. क्यों व्यर्थ में डरते हो ! ” ऐसा कहकर साईंबाबा अपनी कफनी को कमर से भी उंचा कर के दिखाते है. साईं बाबा की  कमर में एक मुर्गी के अंडे के बराबर ४ ग्रंथिया उभरी हुई थी.

साईं बाबा फिर कहते है कि मुझे अपने भक्तों के लिए यह सब भोगना पड़ता है. यह देखकर उस समय मौजूद सभी भक्त आश्चर्यविस्मित रह जाते है. उधर दादासाहेब का पुत्र पूर्ण स्वस्थ हो जाता है.

सद्गुरु की यही विशेषता होती है कि वे अपने भक्तो के दुर्धर दुःख स्वयं पर ले लेते है, पर अपने भक्तो को कष्ट नहीं होने देते है. इसके विपरीत दाम्भिक गुरु अपने स्वयं के अपराधो को भी शिष्यों पर ढोलने से नहीं कतराते है. उनका सारा ध्यान अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाने और उनसे धन बटोरने पर रहता है.