Tuesday, October 13, 2020

साईलीला बोधामृत # 13 सच्ची भावना भगवान तक पहुचती ही है

 बांद्रा के रघुवीर भास्कर पुरंदरे अपने परिवार के साथ शिर्डी के लिए प्रस्थान करते है. प्रस्थान से पहले उनकी धर्मपत्नी  को श्रीमती तर्खड २ बड़े बैंगन देते हुवे बड़ी श्रद्धा से कहती है कि एक बैंगन का भुर्ता और दुसर बैंगन से काचऱ्या ( बैंगन को गोल और पतला काटकर ऊपर मसाला लगाकर तवे पर तेल में सेकना ) बनाकर साईबाबा को भोग लगाइये.  “ठीक है..”, ऐसा कहकर श्रीमती पुरंदरे वे बैंगन ले लेती है.

शिर्डी पहुचकर श्रीमती पुरंदरे एक बैंगन का भुर्ता बनाती है. दूसरा बैंगन वह काचऱ्या बनाने के लिए काटती है.  फिर “अगले दर्शन के समय काचऱ्या साईबाबा को देंगे”,  ऐसा सोच कर वह उस कटे हुवे बैंगन को वैसा ही छोड़ देती है. आरती के बाद सईबाबा को भुर्ते का भोग लगकर, श्रीमती पुरंदरे थाली वही छोडकर चली आती है. साईबाबा सभी लोगो के नेवैद्य को साथ लेकर भोजन करने बैठते है. साईबाबा बैंगन के भुरते को चाव से खाते है. सभी लोगो को लगता है कि बाबा को भुर्ता रुचिकर लगा है.

अचानक साईबाबा कहते है कि उन्हे बैंगन की काचऱ्या खने का मन हो रहा है. साईबाबा का भोजन रुक जाता है.  पर बैंगन कहा से मिते, उस समय शिर्डी में बैंगन आना शुरू नहीं हुवे थे.

श्रीमती पुरंदरे के नेवैद्य में भुर्ता था, इसलिए, उनके पास बैंगन हो सकते है, ऐसा सोचकर भक्तलोग उनके पास आते है. तब जाकर सब को पता चलता है कि साईबाबा का मन काचऱ्या पर क्यों गया था.

साईबाबा षडरस अन्न के स्वाद से ऊपर उठ चुके थे पर श्रीमती तर्खड की श्रद्धा से बाबा को काचऱ्या खिलाने की भावना को वे किस तरह अनदेखा कर सकते थे ?

सन १९१५ के डिसेम्बर के महीने में साईभक्त  बाळाराम मानकर के निधन के बाद उनके पुत्र गोविन्द को उनका और्ध्वदेहिक करने शिर्डी जाना था. वह शिर्डी जाने से पहले तर्खडजी के घर यह बात जताने आता है. उस समय गोविन्द बहुत ही जल्दी में था. श्रीमती तर्खड के घर में साईबाबा को देने के लिए सिर्फ एक बचा हुवा पेढ़ा ही था. बाहर से कुछ प्रसाद लाने के लिये समय भी नही था. वे वही पेढ़ा गोविन्द को दे देती है.

गोविन्द पेढ़ा लेकर चला जाता है. शिर्डी मे अपने पिता के और्ध्वदेहिक करने के बाद वह जब पहली बार साईबाबा के दर्शन को जाता है तब वह उस पेढे को अपने  रहवासस्थल पर भूल जाता है. उस समय बाबा  कुछ नही कहते है.

तिसरे प्रहर मे गोविन्द फिर बाबा के दर्शन को जाता है, इस समय भी वह पेढा ले जाना भूल जाता है.

बार साईबाबा पुछते है कि तुम्ह मेरे लिए क्या लाये हो ?

गोविंद के दिमाग से पेढे की बात मानो निकल ही जाती है. वह कुछ नहीं”, ऐसा उत्तर देता है. साईबाबा उसे श्रीमती तर्खड  द्वारा दिये हुवे पेढे का स्मरण कराते है. तब गोविन्द थोडा सकुचाकर वह पेढ़ा ला देता है. साईबाबा अत्यंत प्रेम से उस पेढ़े का स्वीकार करते है.

साईबाबा के सामने रोज मिठाई और पकवानों  को ढेर पडता था पर श्रीमती तर्खड की अनन्य भावना के साथ भेजे हुवे उस पेढ़े को कैसे अनदेखा कर सकते थे ?

पेढा लाने वाला गोविंद सूतक मे था इसके बावजूद साईबाबा अत्यंत प्रेम से पेढे का स्वीकार करते है.

भगवान राम ने भी शबरी के अनन्य भक्तिभाव को देखकर ही उसके झूठे बेर खाए थे. तात्पर्य यही है कि अगर भक्त की भावना सच्ची है तो वह ईश्वर तक अवश्य ही पहुचती है.

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