Tuesday, October 13, 2020

साईलीला बोधामृत # 8 साईंबाबा को नीम का वृक्ष क्यों प्रिय था ?

 शिर्डी में नाना चोपदार नामक एक व्यक्ति की माँ ने साईंबाबा को किशोरावस्था में देखा था. उनके अनुसार वह बालक गौरवर्ण के होकर अत्यंत सुन्दर थे. वे नीम के वृक्ष के नीचे सर्दी-गर्मी आदि द्वंदों को सहते हुवे  ध्यानस्थ अवस्था में बैठा करते थे. दिन में वे किसी से भी बाते नहीं करते थे, रात में उन्हें किसी का भी भय नहीं रहता था.

वे दिन-रात सदा नीम के वृक्ष के सान्निध्य में ही रहा करते थे. इतनी अल्पायु में ऐसी घोर साधना करने वाले बालक को देखकर शिर्डी के रहिवासी आश्चर्य किया करते थे.

शिर्डी में जब भगवान खंडोबा का संचार कुछ लोगो में हो रहा था, तब शिर्डीवासियो ने भगवान खंडोबा से  उस बालक के सम्बन्ध में अनेक प्रश्न किये.

“यह बालक कहा से आया है ?”

“ किस भाग्यवान का यह पुत्र है ?”

इस पर भगवान खंडोबा लोगो को उस नीम के वृक्ष के नीचे एक विशिष्ट स्थान पर खुदाई करने को कहते है.

खुदाई में ईटो का ढेर मिलता है, उसे हटाने पर एक सुरंग मिलाती है. उस सुरंग में आगे जाने पर चार समई (महाराष्ट्रियन पद्धति का पीतल का दीपस्तंभ ) जलती हुई मिलती है. वहाँ गोमुखी, एक लकड़ी का पटा और माला भी दृष्टिगोचर होती है.

भगवान खंडोबा कहते है इस बालक ने यहाँ 12 वर्षो तक मौन रहकर तपस्या की है. यह सब ज्ञात होने पर लोग साईबाबा से खोद-खोदकर इस बारे में प्रश्न करते है.

इस पर साईबाबा उस स्थान को अपने गुरु का अत्यंत पवित्र समाधि-स्थान बताते है. बाद में साईंबाबा की अनुज्ञा से उस स्थान को ईटे लगाकर फिर से बंद कर दिया जाता है.

बाद में साठेजी नीम के वृक्ष और समाधि-स्थल सहित आसपास की भूमि खरीद लेते है. वे नीम के वृक्ष के चारो और चबूतरा बना देते है . साठेजी उस भूमि पर कर एक बाड़ा  भी बना देते है, जहाँ दर्शनार्थी ठहरा करते थे.

गुरुवार और शुक्रवार को सूर्यास्त के बाद समाधि-स्थान के सामने जो व्यक्ति उद (लोबान) जलाएगा, उसे भगवान श्रीहरि सदा सुखी रखेगा. यह साईबाबा के मुख से निकला हुवा वचन है.

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