Tuesday, October 13, 2020

साईलीला बोधामृत # 1 पानी से दिए जलाने का रहस्य

 

हम सभी साईंबाबा की जल से दियों को प्रज्वलित करने की कथा से अवगत है, हम इसे चमत्कार मानकर रह जाते है पर इस लीला के गूढ़ रहस्य से अनभिज्ञ रहते है. बाबा को बहुत सारे दीपक प्रज्वलित करके द्वारकामाई में रोशनाई करना आनंदित करता था, इसीलिए वे तेल की भिक्षा मंगाकर उससे दीपकों को प्रज्वलित करते थे.
शिर्डी में एक दिन तेल के व्यापारियों ने आपस में तय करके साईबाबा को तेल की भिक्षा देने से मना कर दिया था. साईबाबा निर्विकार रूप से द्वारकामाई में लौट आते है. वह तेल रखने के पात्र (जिसमें थोडा सा ही तेल शेष था ) में कुछ जल उड़ेल देते है, फिर बाबा यह तेल मिश्रित जल स्वयं ही पी जाते है. बाबा योगिराज थे इसीलिए वे उस पिए हुवे जल को वापस तेल के पात्र में उगल देते है. सामान्य व्यक्ति को यह करना असंभव है और वह सिर्फ वमन ही कर सकता है. एक बार गोरखनाथजी द्वारा भी ऐसे ही खीर के प्रसाद को ग्रहण कर फिर उसे उगलकर नेपाल के राजा को प्रसादरूप में देने का उल्लेख आता है, पर उस भाग्यहीन राजा ने उस महाप्रसाद को अस्वीकार कर दिया था.
साईबाबा इसी उगले हुवे जलको सभी दीपकों में भरकर उन्हें प्रज्वलित कर देते है.
तेल में या बाती में जरा सा भी जल का अंश हो तो दीपक बुझने लगता है या फिर फर-फराहट के साथ कैसे तो भी जलने की चेष्टा करता है, पर बाबा के जलाये दिये तो सारी रात जलते रहे थे.
इस लीला का भेद भगवद्गीता के अधोलिखित श्लोक से खुलता है-
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ।।15.14।।
श्लोक की पहली पंक्ति का सीधा-साधा अर्थ यह है कि प्राणियों के भीतरकी भूख जिसे क्षुधा या जठराग्नि भी कहते है वह साक्षात परमात्मा का स्वरूप है. योगिराज साईबाबा ने अपनी इसी जठराग्नि से पानी के दीपक जलाये थे.
और वो शमा क्या बुझे जिसे रोशन खुदा करे. इसीलिए द्वारकामाई में रात भर पानी के दिए जलते रहे थे.

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