साईलीला बोधामृत # 2 साईबाबा की गेहूं पिसने की लीला का रहस्य
आज जब पूरा विश्व कोरोना के प्रकोप से त्रस्त है, साईंबाबा की इस लीला को समझना अत्यंत प्रासंगिक है. साईबाबा एक दिन सुबह उठकर दंतधावन और मुखप्रक्षालन करने के बाद द्वारकामाई में अचानक से हातचक्की में गेहूं पिसने लगते है. जो भी यह देखता वह चकित रह जाता क्योंकि साईबाबा भिक्षा में प्राप्त अन्न से ही अपनी क्षुधापूर्ति करते थे. भिक्षान्न को सभी अन्नों में सबसे पवित्र माना गया है क्योंकि अन्न को खेत में उगाने से लेकर भोजन बनाने तक बड़ी संख्या में सूक्ष्म जीवो की जीवन-हानि होती है. पर भिक्षा में प्राप्त अन्न का सेवन करने वाला इन सभी दोषों से मुक्त रहता है. धीरे-धीरे पुरी शिर्डी में यह बात पसर जाती है. सभी ओर से लोग द्वारकामाई में आने लगते है. अचानक से ४ महिलाये एकसाथ द्वारकामाई में प्रवेश करती है. वे बाबा के हात से हातचक्की की मुठ को छुड़ाकर खुद गेहूं पिसने लगती है. बाबा का उनसे विवाद भी होता है पर वे महिलाये नहीं मानती है. वे सभी बाबा की भक्ति के गीत गाते हुवे गेहूं पिसती रहती है. इस तरह तकरीबन ५ किलो गेहूँ की पिसाई हो जाती है. उन महिलाओ को लगता है कि इस पिसे हुवे गेहू के चार भाग कर बाबा हम सबमें बाट देंगे.
वे महिलाये स्वयं जैसे
ही उस आटे के ४ भाग करने लगती है, बाबा क्रोधित होकर उन्हें फटकार लगाते है और उस
आटे को शिर्डी गाँव की सीमा पर डालने को कहते है. वे महिलाए वैसा ही करती है.
शिर्डी के लोगो को
बाबा की इस कृति का खुलासा कुछ समय बाद होता है. बाबा ने शिर्डी की सीमा पर आटे को
डलवाकर उस समय फैल रही महामारी से शिर्डी की सीमाबंदी करी थी. बाबा की इस कृति से
शिर्डी में महामारी प्रवेश तक नहीं कर सकी थी.
गेहूं के पिसे आटे
से शिर्डी की सुरक्षा कैसे हुई ?
इस रहस्य का खुलासा
भगवद्गीता के अधोलिखित श्लोक से होता है.
मृत्युः
सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः
श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।।10.34।
इस
श्लोक में भगवान् ने जीव के सर्वस्व हरण करने वाली मृत्यु को भी अपनी विभूति बताया है. किसी के प्राणों को हरण करना उसके सर्वस्व का हरण करना होता है क्योंकि प्राणों
के जाने के बाद जीव का कुछ भी अपना नहीं रहता है. सरल शब्दों में कहे तो मृत्यु भी भगवान का ही एक रूप है. महाभारत युद्ध से पहले ही अर्जुन कौरव
योद्धाओ को भगवान के विराट रूप के मुँह में जाते हुवे देखता है.
एक
साथ आनेवाली वे ४ महिलाये भी कोई साधारण महिलाये नहीं थी. वे शिर्डी की चार दिशाओं
की देवियाँ थी जो सामान्य स्त्रियों के वेश में आई थी. जो साईबाबा खुद अपने हातों
से खिचड़ी बनाकर जरुरतमंदो में बांटते थे, क्या वे कभी सामान्य महिलाओ को आटे के
लिए मना करते ?. साईबाबाने वह भक्ष्य विशेष रूप से महामारी के रूप में आने वाले
मृत्युदेवता के लिए बनाया था. वे चारो दिशाओ की देवियाँ जब उस आटे को शिर्डी की
सीमाओं पर डालती है तब शिर्डी चारो दिशाओ से महामारी से सुरक्षित हो जाता है.
और
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि साईबाबा मृत्यु को अन्न का भक्ष देकर उसे तृप्त कर देते
है और महामारी के रूप में मृत्यु शिर्डी के अन्दर प्रवेश नहीं करती है.

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