Tuesday, October 13, 2020

साईलीला बोधामृत # 3 योगिराज साईंबाबा की अघोर यौगिक क्रिया का रहस्य

 ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।18.61।।

भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोक के अनुसार सभी जीवो चाहे वे मनुष्य हो या पशु-पक्षी, सबके ह्रदय में ईश्वर (परम आत्मा ) का अंशात्मक वास होता है, जिसे हम आत्मा कहते है. इसलिए सत्पुरुष धर्म और जाती का भेदभाव नहीं करते है, और वे स्वयं भी जात-पांत और धर्म से ऊपर रहते है. साईबाबा जहाँ रामनवमी और जन्माष्टमी के उत्सव पुरे उत्साह से अपने भक्तों से मनवाते थे, वही मुस्लिमो को ईद और मुहर्रम जैसे पर्व मनाने की भी अनुज्ञा देते थे. द्वारकामाई में किसी भी धर्म और जाती का व्यक्ति कभी भी प्रवेश कर सकता था. साईबाबा के भिक्षान्न में पशु-पक्षी भी अपना मुँह डालकर अपनी क्षुधापूर्ति कर लेते थे, पर साईबाबा कभी किसी भी भूखे जीव पर आक्षेप नहीं लेते थे.

साईबाबा भरी दुपहरी में, जब कोई न हो, यह देखकर, द्वारकामाई से दूर जाकर अघोर यौगिक क्रिया करते थे. वे अपनी पेट के अन्दर की आंतो को निकालकर अन्दर-बाहर से अच्छी तरह धोकर वृक्ष की डाल पर सुखाने के लिए लटका देते थे. कभी वे खंडयोग का आचरण करके अपने हात-पैरो को शरीर से अलग कर देते थे. कुछ लोग साईंबाबा को ऐसी अवस्था में देखकर अत्यंत भयावस्था को प्राप्त हो गए, लेकिन अगले ही दिन बाबा को पुन: सामान्य और सुकुशल अवस्था में देखकर वे दंग रह जाते थे.

लेकिन साईबाबा के अपनी आंतो को बाहर निकालर धोने का क्या प्रयोजन था ?

संसार में पहले केवल एक ही सनातन धर्म था पर कलियुग के प्रभाव के कारण इसके अनेक रूप हो गए है, और इसके हर रूप के अनुसरण करने वाले लोग अपने को दूसरो से भिन्न समझने लगे.

साईबाबा जहाँ सनातनधर्मियों द्वारा अर्पित सात्विक अन्न का स्वीकार करते थे, वही वे अन्य-धर्मियों द्वारा अर्पित आमिष अन्न (अशाकाहारी अन्न) को भी ग्राह्य व त्याज्य भावना के ऊपर रहकर स्वीकार करते थे. क्योंकि भगवद्गीता में भगवान का वचन है कि मेरा भक्त मुझे प्रेम से जो कुछ भी अर्पण करता है, उसे मै स्वीकार करता हुँ. साईबाबा अपने जिस भिक्षापात्र में भिक्षा ग्रहण करते थे, उसी पात्र में लोग रोटी,चावल, दाल, दूध, छाछ, मिठाई आदि दे देते थे. सभी पदार्थ मिलकर एक अत्यंत ही बेस्वाद सा पदार्थ बन जाता था. साईबाबा केवल शरीर धर्म के कारण ऐसा बेस्वाद अन्नग्रहण करते थे, क्योंकि वे षड्रस अन्नों के स्वाद से ऊपर उठ चुके थे.

उपनिषद् के वचन “आहार शुद्धौ सत्व शुद्धिः” के अनुसार अपने चित्त को शुद्ध रखने के लिए आमिषान्न वर्जित है. इस दोष से मुक्त होने के लिए साईबाबा अपने अंतड़ियो को धोकर सुखाते थे. साईबाबा पर आमिष अन्न के सेवन का आरोप लगाने वाले लोगो यह समझना होगा कि बाबा सिर्फ अपने भक्तो ह्रदय  रखने के लिए आमिष अन्न ग्रहण करते थे न कि अपनी जिव्हा को स्वाद का आस्वादन करवाने के उद्देश से. ग्रहण किया हुवा वह आमिष भोजन भी वे अपने आंतो को निकालकर धोने की अघोर यौगिक-क्रिया से दूर कर देते थे.

इस संसार में त्याज्य और ग्राह्य के नियम साधारण संसारी मनुष्यों के लिए होते है, ईश्वर के लिए नहीं. जिस तरह अग्नि सर्वभक्षी होकर भी सदा पवित्र ही रहता है, वैसे ही सत्पुरुष भी हमेशा पवित्र बने रहते है. साईबाबा का आध्यात्मिक अधिकार इतना अधिक था कि स्वयं दत्तावतारी वासुदेवानंद सरस्वती “टेम्बेस्वामी” उन्हें परब्रह्म कहते थे.

 

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