Tuesday, October 13, 2020

साईलीला बोधामृत # 4 सद्गुरु और दाम्भिक गुरु में अंतर

 “ शिष्यापराधे  गुरोर्दण्ड:  इस सूक्ति के अनुसार शिष्य द्वारा किये अपराध का दंड गुरु को मिलता है, ठीक उसी तरह जिस तरह अबोध बालक द्वारा की गई गलती के कारण उसकी माँ को उलाहना सुनना पड़ता है.  सद्गुरु भी अपने शिष्य के लिए माता के समान होते है और इसीलिए उन्हें माऊली भी कहा जाता है.

पूर्वजन्म कृतं पापं व्याधि रुपे पीडते इस शास्त्रवचन के अनुसार सभी जीवो को होने वाले रोग उनके पिछले जन्म के पापो के फलस्वरूप होते है. हर मनुष्य को ये पापो के फल भोगना ही पड़ते है पर जिन भक्तो के सद्गुरु होते है वो अकसर इन रोगरूपी पीड़ा से बच जाते है, लेकिन उनकी भक्ति भी निस्सीम होना चाहिए.

एक बार दादासाहेब खापर्डे के पुत्र को गाँव में आये ग्रंथि ज्वर के कारण जोरदार बुखार आ जाता है. ग्रंथिज्वर एक तरह का बुखार होता है, जिसमे जिसमे गर्दन, सीना या हातों की कांखो में बड़ी बेर या आंवले के बराबर गांठे हो जाती है, कभी-कभी तो इन गांठो की माला सी बन जाती है, इसलिए इसे कंठमाला या गण्डमाला भी कहा जाता है.

दादा साहेब की धर्मपत्नी घबरा जाती है और वह साईबाबा से अपने शहर अमरावती (महाराष्ट्र) जाने की अनुज्ञा मांगती है. इस पर साईबाबा उसे अत्यंत कोमल स्वर में उत्तर देते है :- “ घने बादल छाये हुवे है, जोरदार बारिश होगी और फिर आसमान साफ हो जाएगा. क्यों व्यर्थ में डरते हो ! ” ऐसा कहकर साईंबाबा अपनी कफनी को कमर से भी उंचा कर के दिखाते है. साईं बाबा की  कमर में एक मुर्गी के अंडे के बराबर ४ ग्रंथिया उभरी हुई थी.

साईं बाबा फिर कहते है कि मुझे अपने भक्तों के लिए यह सब भोगना पड़ता है. यह देखकर उस समय मौजूद सभी भक्त आश्चर्यविस्मित रह जाते है. उधर दादासाहेब का पुत्र पूर्ण स्वस्थ हो जाता है.

सद्गुरु की यही विशेषता होती है कि वे अपने भक्तो के दुर्धर दुःख स्वयं पर ले लेते है, पर अपने भक्तो को कष्ट नहीं होने देते है. इसके विपरीत दाम्भिक गुरु अपने स्वयं के अपराधो को भी शिष्यों पर ढोलने से नहीं कतराते है. उनका सारा ध्यान अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाने और उनसे धन बटोरने पर रहता है.

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