साईलीला बोधामृत #5 साईबाबा प्रत्यक्ष ईश्वर के अवतार थे
एक बार दासगणु महाराज को विशेष पर्व के समय प्रयाग संगम जाकर तीर्थ स्थान करने की इच्छा होती है. वे साईबाबा के पास जाकर तीर्थयात्रा के लिए अनुज्ञा माँगते है.
साईबाबा कहते है:- “
इसके लिए इतने दूर जाने कि क्या आवश्यकता है ? शिर्डी ही प्रयाग तीर्थ है, केवल आपका
विश्वास दृढ़ होना चाहिए.”
इस बात पर दासगणु
महाराज साईबाबा के चरणों में अपना सर रख देते है . देखते ही देखते साईबाबा के पैरो के दोनों अंगूठो से दो जलधाराए
बहने लगती है. दोनों जलधाराए मिलकर एक संगम बना देती है. इसी संगम के जल से आचमन
और प्रोक्षण करके दासगणु महाराज धन्य हो जाते है.
यह चमत्कार देखकर
दासगणु महाराज के चरणों से अश्रु की धाराए बहने लगती है. साईबाबा ने अपनी उक्ति को
सार्थक कर के दिखाया था.
गंगाजी को भगवान
विष्णु के चरणों से निकलने के कारण अत्यंत पवित्र माना जाता है, और यही गंगा जब
यमुना जी से (जिसके तट पर भगवन श्रीकृष्ण ने अनेक लीलाए की थी) से मिलती है, उस
संगम के महत्त्व का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता है.
उन दिनों में
तीर्थयात्राए आज के दौर की तरह सुलभ न होकर अत्यंत ही कष्टप्रद थी. पर दासगणु
महाराज साईबाबा कृपा से सहज ही उस संगम से लाभान्वित हो जाते है.

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