Tuesday, October 13, 2020

साईलीला बोधामृत # 6 साईबाबा का दासगणुजी को ईश्वर दर्शन कराना

 साईबाबा की ईश्वर के नामस्मरण पर बड़ी प्रीति थी. वे स्वयं “अल्लाह मालिक” ऐसा सतत नामस्मरण करते रहते थे. भगवद्गीता में जिस निर्गुण ईश्वर का ‘अव्यक्त’ ऐसा उल्लेख किया गया है, उसे ही कालांतर में सनातन धर्म से ही निकले एक धर्म में ‘अल्लाह’ कहा जाता है. भगवद्गीता के अनुसार सगुण ईश्वर के अपेक्षा निर्गुण या अव्यक्त ईश्वर की उपासना करना अत्यंत ही कठिण होता है और इसीलिए केवल उच्च कोटि के साधक या सिद्ध ही इस मार्ग को अपना सकते है. 

साईंबाबा उस निर्गुण ईश्वर का सतत नामस्मरण करते थे. साईबाबा धर्म को पिता के समान बताकर अपने सभी भक्तो को अपने-अपने धर्मो के अनुसार ईश्वरभक्ति करने का निर्देश देते थे. अगर कोई सामान्य व्यक्ति निर्गुणभक्ति करे तो उसे ईश्वर को प्राप्त करना बड़ा ही कष्टप्रद हो जाता है और इस राह में पाखंड और दाम्भिकता का भी भय बना रहता है. इसीलिए साईबाबा स्वयं तो सदैव निर्गुण भक्ति करते थे पर अपने सगुण भक्तो को सगुण भक्ति का ही मार्गदर्शन देते थे.

साईबाबा एक बार अपने शिष्य दासगणुजी को एक सप्ताह का नामस्मरण करने को कहते है. इस पर दासगणु जी प्रतिप्रश्न करते है कि क्या इससे भगवान विट्ठल प्रकट होंगे ? इस पर साईबाबा दासगणु जी के वक्षस्थल को स्पर्श करके उत्तर देते है कि अगर भक्त भावार्थी होगा तो विट्ठल जरुर प्रगट होगा.

डाकोर के रणछोड़ भगवान हो या पंढरपुर के विट्ठल भगवान, वही भगवान शिर्डी की इस द्वारकामाई में भी है. व्यर्थ में दूर जाने की क्या जरुरत है ? साईबाबा के कहने का गूढार्थ यह था कि ईश्वर तो हर जगह विद्यमान होता है उसे पाने के लिए केवल उत्कट भक्ति की आवश्यकता होती है. भक्त पुंडलिक कौनसा मंदिर में गया था ? वह तो घर पर ही अपने माता-पिता रूपी ईश्वर की सेवा-रूपी उपासना करता रहा और ईश्वर को स्वयं उसके समक्ष  प्रकट होना पड़ा. साईबाबा का वचन सत्य होता है, नामसप्ताह के सम्पूर्ण होते ही दासगणु महाराज को भगवान विट्ठल के दर्शन हो जाते है.

पर यहाँ प्रश्न यह उठता है कि नामसप्ताह तो अनेक भक्त करते है, पर उन्हें ईश्वर दर्शन क्यों नहीं होता है ?

भगवद्गीता के अनुसार सभी प्राणियों के ह्रदय में ईश्वर वास करता है. पर यह ईश्वर माया के प्रभाव से प्राणियों को सुप्त प्रतीत होता है. साईंबाबा दासगणु जी के ह्रदय को छूकर माया का प्रभाव हटा देते है और इसीलिए नामसप्ताह के समाप्त होते ही दासगणुजी को विट्ठल दर्शन हो जाते है. यही सद्गुरु कृपा का फल है.

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