साईलीला बोधामृत # 7 साईंबाबा अंतर्यामी थे
काकासाहेब दीक्षित प्रतिदिन स्नानादि से निवृत्त होकर आसनस्थ होकर ईश्वर का ध्यान किया करते थे. एक दिन उन्हें ध्यान में विट्ठल भगवान के दर्शन होते है. उस दिन काका साहेब जैसे ही साईबाबा के दर्शन करने जाते है, साईबाबा उनके बिना कुछ कहे ही कहते है :-“ विट्ठल पाटिल आये थे ना ! भेट हो गयी उनसे ? वे बहुत ही भगोड़े है. रस्सी से बांध कर उन्हें उन्हें वश में कर लो. एक क्षण के लिए भी अगर ध्यान हटा तो वे आँखों से ओझल हो जाते है.”
साईंबाबा दीक्षितजी
को भगवान को भक्ति की डोर से बांधने को कह रहे थे. भक्त का ध्यान जरा सा भी भगवान
से हटकर संसार में चला जाताहै तो तो भगवान भक्त से दूर हो जाते है. गोपियों जैसी अनन्य भक्तों को भी ऐसे ही कुछ अनुभव
आये थे. वे भगवान श्रीकृष्ण को छलिया, निर्मोही इत्यादि शब्दों से संबोधित किया
करती थी. इसीलिए, सभी संत अपने भक्तो से सदैव नामस्मरण रूपी भक्ति करने का आग्रह
करते है.
उसी दिन काका साहेब
की दृष्टि एक शिर्डी में आये परदेसी व्यक्ति पर पड़ती है. वह व्यक्ति भगवान विट्ठल की तस्वीरे बेच रहा था.
आश्चर्य की बात तो यह थी कि उन चित्रों में भगवान विट्ठल की छवि एकदम वैसी ही थी
जैसी उनके ध्यान में आई थी.
दीक्षितजी प्रतिफल
देकर एक चित्र खरीद लेते है और अपने पूजनकक्ष में उसे लगाकर भक्ति भाव से प्रतिदिन
उसका पूजन करने लगते है.
आज भी जब साईबाबा
अपना पञ्चभौतिक देह त्याग चुके है, तब भी वे अपने सुज्ञ भक्तों पर सदा अपनी दृष्टि
बनाये रखते है और उनका सदैव रक्षण और मार्गदर्शन करते रहते है. अनेक साईं भक्तो को
ऐसे अनुभव आते रहते है.

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