Tuesday, October 13, 2020

साईलीला बोधामृत # ९ बाबा का नाम साईं कैसे पड़ा ?

 शिर्डी के लोगों को अपने गुरु के समाधि स्थान के बारे में बताने के बाद वह बालक शिर्डी से गुप्त हो जाता है. इस समय तक लोग बाल साईं को बालक ही कहते थे, उनका नाम किसी को भी मालूम नहीं था.

कुछ वर्षो के बाद धूप गाँव के अधिकारी चाँद पाटिल किसी से कार्य से औरंगाबाद आते है. वहां उनकी घोड़ी गुम हो जाती है. दो महीने तक खोज करने के बाद भी जब घोड़ी का कोई पता नहीं चलता है तब निराश चाँद पाटिल अपने गाँव की और लौटते है. साढ़े चार कोस चलने बाद उन्हें एक किशोर फ़क़ीर आम के वृक्ष के नीचे बैठे हुवे मिलता है. सर पर टोपी, बदन में  कफनी , बगल में सटका और हातों में तमाखू भरी हुई चिलीम.

किशोर फ़क़ीर चाँद पाटिल को सुस्ताने के लिए कहते है और उनकी उदासी का कारण जानकर उत्तर देते है :-“चाँद..., तुम्हारी घोड़ी को नाले के पास खोजो.”

और आश्चर्य देखिये, दो महीने से खोई हुई घोड़ी चाँद पाटिल को मिल जाती है.

इसके बाद वह फ़कीर अपने चिमटे को जमीन में मारकर वहां अग्नि प्रगट कर देते है. उसी अग्नि से चिलीम जलती है. इसके बाद वह किशोर फ़कीर जमीन में सटका मारकर पानी निकाल देता है.

पञ्च-महाभूतों में से दो पर उस किशोर फ़कीर का अधिकार देखकर चाँद पाटिल समझ जाते है कि यह फ़कीर कोई साधारण न होकर एक आध्यात्मिक अधिकार से संपन्न हस्ती है.

चाँदभाई उस  फ़कीर को अपने घर आमंत्रित करते है. फ़कीर भी उसका आमंत्रण स्वीकार कर लेते है.

कुछ दिनों के बाद चाँद पाटिल की पत्नी के भतीजे का विवाह शिर्डी गाँव में तय होता है. चाँद भाई उस युवा फ़कीर को भी बारात में आने का निमंत्रण देते है. इसके बाद वह किशोर फ़कीर भी बारात के साथ शिर्डी में आता हैं.

शिर्डी में भगवान खंडोबा के मंदिर के पुजारी म्हाळसापति उन्हें देखते ही मुग्ध से हो जाते है और अत्यंत आदरपूर्वक उनके मुख से दो शब्द निकलते है:- “ या.. साई “  अर्थात आइये साई “. घटना के बाद से ही लोग उन्हे साई इस नाम से संबोधित करने लगते है.

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