साईलीला बोधामृत # 10 भक्तो के संकट स्वयं पर लेने वाले साईबाबा
सन १९१० का धनतेरस का दिन था. साईबाबा धुनी के पास बैठकर लकडिया जला रहे थे. धुनी भी तीव्रता से जल रही थी. अचानक साईबाबा अपने दोनों हात धुनी में डालकर निश्चित रूप से बैठे रहते है. उस समय उनकी सेवा में रत माधवराव देशपांडेजी की दृष्टि अचानक साईबाबा की इस कृति पर पड़ती है. माधवराव साईबाबा की कमर को दोनों हात से पकड़ते हुवे उन्हें पीछे खीच लेते है. उन्हें धुनी से दूर करकर देशपांडेजी पूछते है:-“अरे भगवान ! आपने ये क्या कर दिया ? ”
इस पर साईबाबा उत्तर
देते है:-“ अरे, एक भक्त लोहार की पत्नी अपने कंधे पर अपनी छोटी सी बेटी को लेकर
भट्टी में चमड़े के भाते से हवा कर रही थी. अचानक उसके पति के एकदम रोबीली आवाज में
बुलाने पर वह भय से एकदम उठ खड़ी होती है. खड़े
होते समय बच्ची कंधे पर है, यह बात उसके ध्यान में ही नहीं रहती है. वह बच्ची एकदम
से छिटककर धधकती हुई भट्टी में गिर जाती है.अच्छा हुवा कि मेरे हात जल गए पर उस
बिटिया के प्राण बच गए.”
इसीलिए अंतर्यामी
साईबाबा को जैसे ही इस भयंकर घटना का ज्ञान होता है वे जलती धुनी में अपने दोनों हात डाल देते है. साईबाबा
के दोनों हात बुरी तरह से जल जाते है पर उधर उस बच्ची को भट्टी से बाहर निकालने पर
उसके शरीर पर जलने का नामोनिशान तक नहीं मिलता है.
साईबाबा गरीबो में बांटने
के लिए खिचड़ी बनवाते थे. बड़ी सी सिगड़ी में खौलती हुई खिचड़ी को किसी कड़छी से चलाने की
जगह वे अपने दाहिने हात की आस्तीन को बाजु तक चढाकर चलाते थे. भक्तो को अपने करकमल
का कृपाप्रसाद मिले इस दृष्टि से किये गए इस कृत्य में साईबाबा का हात बिलकुल भी
नहीं जलता था. लेकिन उस दिन धुनी में अपने हातों को डालने से साईबाबाके हात बुरी
तरह जल जाते है. उस लोहार भक्त की बच्ची के ऊपर आया हुवा अग्नि का संकट बाबा खुद
भोगकर उसका रक्षण करते है. सच्चे सद्गुरु ऐसे ही होते है.

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