Wednesday, July 21, 2021

साईबाबा का वचन तो सत्य होकर ही रहेगा


 


#साईलीला_बोधामृत  # 81

सन्दर्भ: साईसच्चरित अध्याय 36

सोलापुर शहर के निवासी सखाराम औरंगाबादकर की पत्नी अपने सौतेले पुत्र के साथ बाबा के दर्शन करने शिर्डी आती है. श्रीमती औरंगाबादकर के विवाह को 27 साल हो गए थे पर वह अभी तक संतान सुख से वंचित थी. श्रीमती औरंगाबादकर अनेक देवी-देवताओ से मनौती मांगकर थक गई थी पर उसे संतान की प्राप्ति नहीं होती है.

सब जगह से निराश होकर वह अपने सौतेले पुत्र विश्वनाथ को लेकर बाबा के पास आई थी.

बाबा हर समय भक्तों की भीड़ से घिरे रहते थे इसी कारण वह बाबा को अपना मनोगत नहीं बता पा रही थी !

वह और विश्वनाथ दो महीने तक बाबा की सेवा करते हुवे शिर्डी में रहते है.

आख़िरकार वह महिला शामाजी ( माधवराव देशपांडे ) से निवेदन करती है कि कृपया आप मेरी समस्या से बाबा को अवगत करवाइए. साथ ही यह बात किसी भी अन्य भक्त के कानों में न पड़े , यह शर्त भी रखती है.

इस पर शामाजी कहते है:-“ अरे ! द्वारकामाई तो सदा ही भरी रहती है, यहाँ कोई न कोई भक्त तो आता ही रहता है. साईबाबा का दरबार तो खुला दरबार है और यहाँ कोई भी, कभी भी, आ सकता है, यहाँ किसी भी किस्म की पाबन्दी नहीं है.

आप तो बस हाथों में नारियल और अगरबत्ती लेकर बैठे रहना, बाबा प्रतिदिन सभामंडप में एक पत्थर पर भोजन करने बैठते है, अगर भोजन के बाद वे प्रसन्न भाव में दिखेंगे तो मैं आपको इशारा कर दूंगा.  आप तुरंत ही उठकर वहां आ जाना.

एक दिन भोजन  के उपरांत बाबा अपने हाथ धोते है, शामा जी वस्त्र से उनके हाथ पोछते है. बाबा उस समय बहुत ही प्रसन्न अवस्था में थे, वे शामाजी के गाल पर चिकोटी काट लेते है.

शामा जी और  बाबा का मित्रवत व्यवहार तो था ही, पर शामाजी बनावटी क्रोध का भाव लाकर बाबा से कहते है:- “ बाबा, ऐसा करना क्या ठीक है ? हमें नहीं चाहिए ऐसा भगवान जो अपने भक्तों को ऐसी चिकोटी काटे ! हमारी सेवा का क्या यही फल है ? ”

इस पर बाबा प्रत्युत्तर देते है:-“ अरे शामा ! तुम्हारा और मेरा 72 जन्मों का नाता ( गुरु और शिष्य का ) है. क्या मैंने किसी भी अन्य जन्म में ऐसा करा है ? ”

शामाजी जवाब देते है:-“ अरे बाबा , हमें न तो आपका सम्मान चाहिए और न हीं स्वर्गलोक की प्राप्ति चाहिए !  हमें तो बस ऐसा भगवान चाहिए जो भूख लगने पर हमें मिठाई खिलाये. हमारी निष्ठा सदैव साईचरणों में बनी रहे, हम केवल तो केवल ऐसी कृपा दृष्टि चाहिए. “

बाबा कहते है कि इसीलिए ही तो मै यहाँ आया हूँ, और वे अपने बैठने की जगह पर जाकर बैठ जाते है.

इसके बाद शामाजी उस महिला को इशारा कर देते है, वह महिला तुरंत ही उठकर बाबा को श्रीफल ( नारियल ) भेट कर उनकी चरण वंदना करती है.

श्रीमती औरंगाबादकर का भेट किया हुवा नारियल सुखा था.

बाबा उस नारियल को पटक कर देखते  है , फिर वे शामा से कहते है कि यह नारियल तो बहुत ही गुड-गुड कर के बज रहा है.

शामाजी कहते है:- “ जिस तरह यह नारियल गुड-गुड कर रहा है, उसी तरह इस महिला की भी इच्छा है कि बच्चे के कारण उसके पेट में भी ऐसी ही गुड-गुड हो. आप उस पर अपनी कृपादृष्टि फेरते हुवे उसकी गोद में नारियल को डाले ताकि उससे जल्द ही संतान की प्राप्ति हो ! “

बाबा कहते है कि ऐसे नारियलो से क्या संतान की प्राप्ति होती है ?

यह कैसी भ्रान्ति लोगों मै फैली है ?

अब तो शामाजी अड़ ही जाते है, वे कहते है कि आपके आशीर्वाद देने से निश्चित ही उस महिला को संतान की प्राप्ति हो जाएगी. उस महिला को आशीर्वाद देना छोड़कर , आप जबरन ही मुझसे बहस कर रहे हो ! कृपा करके उसे नारियल का प्रसाद दे दो.”

इस पर बाबा उन्हें उस नारियल को फोड़ने को कहते है.

शामाजी वह नारियल उस महिला को देने को कहते है.

बहुत देर तक बाबा और शामाजी में प्रेम भरा विवाद होता रहता है.

आखिर बाबा थक-हारकर कहते है, ” जाओ....होगी संतान...”

शामाजी फिर भी नहीं छोड़ते है, वे कहते है:-“ कब होगी, यह बताओ ? ”

“12 महीने बाद”,  बाबा के ऐसा कहते ही शामाजी  नारियल फोड़ देते है.

नारियल की गिरी के एक तुकडे को बाबा और शामाजी खा लेते है और दूसरा टुकड़ा प्रसाद के तौर पर उस महिला को दे दिया जाता है.

अब तो शामाजी भक्ति के जोश में अपना होश खो बैठते है, वे उस महिला से कहते है:-“ आप साक्षी हो, अगर 12 महीने में आपको संतान नहीं हुई तो मै ऐसा ही एक नारियल बाबा के सर पर फोड़कर उन्हें द्वारकामाई के बाहर खदेड़ दूंगा, अगर मैं ऐसा नहीं कर पाया तो अपना नाम माधव नहीं लगाऊंगा !”

शामाजी को बाबा पर पराकोटी का विश्वास था और इसी विश्वास के चलते वे श्रीमती औरंगाबादकर को आश्वस्त करने के लिए ऐसी बात करते है, उन्हें पूर्ण विश्वास था कि बाबा का वचन है तो सत्य होकर ही रहेगा.

अंगद भी भगवान राम पर इसी अटूट विश्वास के चलते रावण की सभा में अपना एक पैर जमकर घोषणा करता है कि अगर किसी ने मेरे इस पैर को हिला भी दिया तो रामजी बिना सीता माता को लिए वापस लौट जायेंगे !

शामाजी के इस तरह आश्वस्त करने पर वह महिला ख़ुशी-ख़ुशी बाबा के चरणस्पर्श कर लौट जाती है.

अगले तीन महीने में ही उसका गर्भ ठहर जाता है और ठीक 12 महीने के अन्दर उसे एक पुत्र की प्राप्ति होती है.

अपने पुत्र के 5 महीने का होने पर वह अपने पति और नन्हे शिशु के साथ शिर्डी आती है.

वह बाबा के चरणों में 500 रुपये भेट करती है. इसी पैसे से बाबा के घोड़े श्यामकर्ण के बांधने के स्थान के चारो तरफ की दीवारे बनती है.

सिद्ध संतो का वचन कभी भी निष्फल नहीं होता है.

Thursday, July 15, 2021

भगवान दत्तात्रेय के प्रत्यक्ष अवतार है साईबाबा

 




#साईलीला_बोधामृत  # 80

एक बार गोमान्तक (गोवा) से दो मित्र साईबाबा के पास आते है. बाबा के चरणस्पर्श करने के पश्चात् बाबा एक मित्र से 15 रुपये माँगते है. वह भक्त ख़ुशी-ख़ुशी 15 रुपये दे देता है.

यह देखकर दूसरा मित्र स्वयं होकर बाबा को 35 रुपये बतौर दक्षिणा देना चाहता है , पर बाबा उसकी दक्षिणा स्वीकार ही नहीं करते है.

शामाजी के पूछने पर बाबा कहते है, “ अरे ! इस द्वारकामाई में लोग ऋणमुक्त होने के लिए ही तो आते है, वरना मुझ जैसे फ़क़ीर को धन की क्या आवश्यकता है ? ऋण, बैर और हत्या, इन तीनो कर्मो के फल करने वाले को कभी न कभी तो भोगने ही पड़ते है ! इसीलिए मैं ऋणी लोगों से दक्षिणा लेकर उन्हें ऋणमुक्त कर देता हूँ ताकि उस ऋण के चलते उनके जीवन में दुःख और आपदाए न आये  !”

इसके बाद बाबा उनमे से एक मित्र के नवस (मनौती) के बारे में बताते है. उसने नौकरी मिलने पर पहली तनख्वाह (पगार) भगवान को देने का नवस किया था.

उसे नौकरी भी मिल जाती है, और धीरे-धीरे पहला पगार 15 रुपये से बढकर 700 रुपये तक भी हो जाता है, पर वह नवस की पूर्णता करना भूल ही जाता है.

बाबा आगे कहते है :-“ इन लोगों की किस्मत अच्छी होने से , अब इनका यहाँ आना हुवा है !”

इसके बाद साईबाबा एक अलग सी ही कहानी सुनाने लगते है.

बाबा कहते है : “ एक बार समुद्र तट पर घुमते-घुमते मैं एक हवेली के बाहर ओटले पर बैठ जाता हूँ. उस हवेली के  मालिक एक धनवान ब्राह्मण मेरा स्वागत कर मुझे भोजन करवाता है. वह मुझे हवेली मे सोने के लिए एक कमरा भी दे देता है.

लेकिन रात मे वह ब्राह्मण दीवार फोडकर कमरे के अंदर आ जाता है और मेरी जेब काटकर 30,000 रुपये चुरा लेता है.

मैं दुखी होकर 15 दिनो तक उसी हवेली के ले पर बैठा रहता हूँ. 16 वे दिन वहां एक फकीर आता है. उसे अपना दुखडा सुनाने पर वमुझे एक उपाय बताता है.

फ़क़ीर कहता है कि मुझे अपना धन वापस मिलने तक अपना एक प्रिय भोज्य पदार्थ छोड़ना पड़ेगा !

मैं वैसा ही करता हूँ और जल्दी ही मेरा धन मुझे वापस मिल जाता है. उसके बाद में नाव में बैठकर समुद्र प्रवास कर एक बंदरगाह पहुँचता हूँ और वहां से स्थलमार्ग से द्वारकामाई आ जाता हूँ.”

बाबा की कहानी ख़त्म हो जाती है.

इसके बाद बाबा शामाजी को आज्ञा देते है कि इन लोगों को भोजन करवाने अपने घर ले जाओ.

यह कहानी शामाजी को अत्यंत ही अविश्वसनीय लगती है. उस समय 30 000 रुपये अत्यंत ही बड़ी रकम हुवा करती थी, उन्हें लगता है कि इतना धन बाबा के पास कैसे हो सकता है ! अगर हुवा भी तो इतना धन वह अपनी जेब में लेकर क्यों घूमेंगे ?

इससे भी बड़ी बात तो यह है कि बाबा तो कभी शिर्डी छोड़कर गए ही नहीं है ! उनका कभी किसी समुद्र तट पर जाने का तो सवाल ही नहीं उठता है !

शामाजी से रहा नहीं जाता है, वे उन दो मित्रो को भोजन करवाते समय पूछ ही लेते है, “ क्या आपको बाबा की कहानी समझ में आई ? “

वे लोग कहते है कि भोजन के बाद वे इस विषय पर सविस्तर वार्तालाप करेंगे.

भोजन के उपरांत एक मित्र सद्गद होकर कहता है, “ बाबा अंतर्यामी है!  बाबा ने जो वृतांत सुनाया वह हम लोगों का ही है.

मैंने ही भगवान दत्तात्रेय से नौकरी मिलने के बाद उन्हें अपना पहला पगार अर्पण करने की मनौती मांगी थी.

पहली नौकरी 15 रुपये प्रतिमाह की मिली. आगे पगार बढ़ता गया पर नवस पूर्ण करना रह ही गया.

बाबा ने मुझसे दक्षिणा नहीं ली है, वरन मैंने ही अपना पिछला कर्जा चुकाया है.”

इसके बाद दुसरा मित्र अपनी कहानी सुनाता है, “ दीवार में बनी एक अलमारी में मेरे 30,000 रुपये रखे हुवे थे . मेरा परिचित एक ब्राह्मण व्यक्ति दूसरी तरफ से दीवार को फोड़कर वह धन चुरा लेता है.

इस घटना के 15 दिन बाद मैं खिन्न मन से एक ओटले के ऊपर बैठा हुवा था. वहां एक फ़क़ीर आकर मेरी खिन्नता का कारण पूछता है. दुःख का कारण बताने पर वह फ़क़ीर मुझे एक उपाय बताता है.

वह कहता है कि कोपरगाँव तालुका के शिर्डी गाँव में एक साई नामक अवलिया फ़क़ीर रहते है.

तुम यह मन्नत मानगो कि जब तक उनके दर्शन नहीं होंगे तब तक तुम अपना एक प्रिय भोज्य पदार्थ नहीं खाओगे.

मैंने भी निश्चय किया कि जब तक चोरी गए हुवे पैसे वापस नहीं मिल जाते और साईबाबा के दर्शन नहीं हो जाते, तब तक मैं अपने प्रिय भोज्य पदार्थ का त्याग करूँगा.

केवल 15 दिनों के बाद , जिसने रुपये चोरी किये थे वह स्वयं ही आत्मग्लानीवश मुझे रुपये लौटा देता है.

रुपये मिलते ही मैंने भी उस ब्राह्मण व्यक्ति को माफ़ कर दिया, लेकिन जिस फ़क़ीर ने मुझे यह उपाय बताया था, वह कही नहीं मिला.

इसके बाद हम दोनों मित्र शिर्डी चले आते है. “

दुसरे मित्र के अनुभव से शामाजी तुरंत ही समझ जाते है कि साईबाबा भगवान दत्तात्रेय के प्रत्यक्ष अवतार है, वरना बाबा को कैसे पता चलता कि पहले मित्र ने नौकरी मिलने पर भगवान दत्तात्रेय को 15 रुपये ( पहला पगार ) चढाने का नवस किया है !

बाबा एक मित्र से 15 रुपये की दक्षिणा मांगते है पर दुसरे मित्र का कोई ऋण नहीं होने से उसकी 35 रुपये की दक्षिणा अस्वीकार कर देते है, इस व्यवहार का कारण भी उन्हें भली-भांति समझ में आ जाता है.

साथ ही उन्हें बाबा के उस वचन पर भी पूर्णविश्वास हो जाता है जिसमें बाबा कहते है:- “ मेरे भक्त चाहे सात-समुद्र पार क्यों न हो , मुझे उनकी हर गतिविधि के बारे में पता रहता है, क्योंकि मैं सबके ह्रदय में निवास करता हूँ. “

अर्जुन श्रीकृष्ण से मित्रवत व्यवहार करते थे पर कुरुक्षेत्र में ही उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की विराटता का ज्ञान होता है .

शामाजी बाबा के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे पर बाबा से उनका भी व्यवहार एक मित्र के माफिक था, साईबाबा ने वह कहानी शामाजी को अपने निजस्वरुप का यथार्थ बोध करवाने के लिए ही सुनाई थी.

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