साईबाबा का वचन तो सत्य होकर ही रहेगा
#साईलीला_बोधामृत # 81
सन्दर्भ: साईसच्चरित अध्याय 36
सोलापुर शहर के
निवासी सखाराम औरंगाबादकर की पत्नी अपने सौतेले पुत्र के साथ बाबा के दर्शन करने
शिर्डी आती है. श्रीमती औरंगाबादकर के विवाह को 27 साल हो गए थे पर वह अभी तक
संतान सुख से वंचित थी. श्रीमती औरंगाबादकर अनेक देवी-देवताओ से मनौती मांगकर थक गई
थी पर उसे संतान की प्राप्ति नहीं होती है.
सब जगह से निराश
होकर वह अपने सौतेले पुत्र विश्वनाथ को लेकर बाबा के पास आई थी.
बाबा हर समय भक्तों
की भीड़ से घिरे रहते थे इसी कारण वह बाबा को अपना मनोगत नहीं बता पा रही थी !
वह और विश्वनाथ दो
महीने तक बाबा की सेवा करते हुवे शिर्डी में रहते है.
आख़िरकार वह महिला
शामाजी ( माधवराव देशपांडे ) से निवेदन करती है कि कृपया आप मेरी समस्या से बाबा
को अवगत करवाइए. साथ ही यह बात किसी भी अन्य भक्त के कानों में न पड़े , यह शर्त भी
रखती है.
इस पर शामाजी कहते
है:-“ अरे ! द्वारकामाई तो सदा ही भरी रहती है, यहाँ कोई न कोई भक्त तो आता ही
रहता है. साईबाबा का दरबार तो खुला दरबार है और यहाँ कोई भी, कभी भी, आ सकता है,
यहाँ किसी भी किस्म की पाबन्दी नहीं है.
आप तो बस हाथों में
नारियल और अगरबत्ती लेकर बैठे रहना, बाबा प्रतिदिन सभामंडप में एक पत्थर पर भोजन
करने बैठते है, अगर भोजन के बाद वे प्रसन्न भाव में दिखेंगे तो मैं आपको इशारा कर
दूंगा. आप तुरंत ही उठकर वहां आ जाना.
एक दिन भोजन के उपरांत बाबा अपने हाथ धोते है, शामा जी
वस्त्र से उनके हाथ पोछते है. बाबा उस समय बहुत ही प्रसन्न अवस्था में थे, वे
शामाजी के गाल पर चिकोटी काट लेते है.
शामा जी और बाबा का मित्रवत व्यवहार तो था ही, पर शामाजी
बनावटी क्रोध का भाव लाकर बाबा से कहते है:- “ बाबा, ऐसा करना क्या ठीक है ? हमें
नहीं चाहिए ऐसा भगवान जो अपने भक्तों को ऐसी चिकोटी काटे ! हमारी सेवा का क्या यही
फल है ? ”
इस पर बाबा
प्रत्युत्तर देते है:-“ अरे शामा ! तुम्हारा और मेरा 72 जन्मों का नाता ( गुरु और
शिष्य का ) है. क्या मैंने किसी भी अन्य जन्म में ऐसा करा है ? ”
शामाजी जवाब देते
है:-“ अरे बाबा , हमें न तो आपका सम्मान चाहिए और न हीं स्वर्गलोक की प्राप्ति
चाहिए ! हमें तो बस ऐसा भगवान चाहिए जो
भूख लगने पर हमें मिठाई खिलाये. हमारी निष्ठा सदैव साईचरणों में बनी रहे, हम केवल तो केवल ऐसी कृपा दृष्टि
चाहिए. “
बाबा कहते है कि
इसीलिए ही तो मै यहाँ आया हूँ, और वे अपने बैठने की जगह पर जाकर बैठ जाते है.
इसके बाद शामाजी उस
महिला को इशारा कर देते है, वह महिला तुरंत ही उठकर बाबा को श्रीफल ( नारियल ) भेट
कर उनकी चरण वंदना करती है.
श्रीमती औरंगाबादकर
का भेट किया हुवा नारियल सुखा था.
बाबा उस नारियल को
पटक कर देखते है , फिर वे शामा से कहते है
कि यह नारियल तो बहुत ही गुड-गुड कर के बज रहा है.
शामाजी कहते है:- “ जिस
तरह यह नारियल गुड-गुड कर रहा है, उसी तरह इस महिला की भी इच्छा है कि बच्चे के
कारण उसके पेट में भी ऐसी ही गुड-गुड हो. आप उस पर अपनी कृपादृष्टि फेरते हुवे उसकी
गोद में नारियल को डाले ताकि उससे जल्द ही संतान की प्राप्ति हो ! “
बाबा कहते है कि ऐसे
नारियलो से क्या संतान की प्राप्ति होती है ?
यह कैसी भ्रान्ति
लोगों मै फैली है ?
अब तो शामाजी अड़ ही
जाते है, वे कहते है कि आपके आशीर्वाद देने से निश्चित ही उस महिला को संतान की
प्राप्ति हो जाएगी. उस महिला को आशीर्वाद देना छोड़कर , आप जबरन ही मुझसे बहस कर
रहे हो ! कृपा करके उसे नारियल का प्रसाद दे दो.”
इस पर बाबा उन्हें उस
नारियल को फोड़ने को कहते है.
शामाजी वह नारियल उस
महिला को देने को कहते है.
बहुत देर तक बाबा और
शामाजी में प्रेम भरा विवाद होता रहता है.
आखिर बाबा थक-हारकर
कहते है, ” जाओ....होगी संतान...”
शामाजी फिर भी नहीं
छोड़ते है, वे कहते है:-“ कब होगी, यह बताओ ? ”
“12 महीने बाद”, बाबा के ऐसा कहते ही शामाजी नारियल फोड़ देते है.
नारियल की गिरी के एक
तुकडे को बाबा और शामाजी खा लेते है और दूसरा टुकड़ा प्रसाद के तौर पर उस महिला को
दे दिया जाता है.
अब तो शामाजी भक्ति
के जोश में अपना होश खो बैठते है, वे उस महिला से कहते है:-“ आप साक्षी हो, अगर 12
महीने में आपको संतान नहीं हुई तो मै ऐसा ही एक नारियल बाबा के सर पर फोड़कर उन्हें
द्वारकामाई के बाहर खदेड़ दूंगा, अगर मैं ऐसा नहीं कर पाया तो अपना नाम माधव नहीं लगाऊंगा
!”
शामाजी को बाबा पर
पराकोटी का विश्वास था और इसी विश्वास के चलते वे श्रीमती औरंगाबादकर को आश्वस्त
करने के लिए ऐसी बात करते है, उन्हें पूर्ण विश्वास था कि बाबा का वचन है तो सत्य
होकर ही रहेगा.
अंगद भी भगवान राम
पर इसी अटूट विश्वास के चलते रावण की सभा में अपना एक पैर जमकर घोषणा करता है कि
अगर किसी ने मेरे इस पैर को हिला भी दिया तो रामजी बिना सीता माता को लिए वापस लौट
जायेंगे !
शामाजी के इस तरह
आश्वस्त करने पर वह महिला ख़ुशी-ख़ुशी बाबा के चरणस्पर्श कर लौट जाती है.
अगले तीन महीने में ही
उसका गर्भ ठहर जाता है और ठीक 12 महीने के अन्दर उसे एक पुत्र की प्राप्ति होती
है.
अपने पुत्र के 5
महीने का होने पर वह अपने पति और नन्हे शिशु के साथ शिर्डी आती है.
वह बाबा के चरणों
में 500 रुपये भेट करती है. इसी पैसे से बाबा के घोड़े श्यामकर्ण के बांधने के
स्थान के चारो तरफ की दीवारे बनती है.
सिद्ध संतो का वचन
कभी भी निष्फल नहीं होता है.
