Tuesday, October 13, 2020

साईलीला बोधामृत # 14 साईबाबा की पञ्चमहाभूतों पर सत्ता

 एक बार शिर्डी मे सूर्यास्त के बाद घनघोर बादल छा जाते है. पूरा आसमान काला हो जात है.बादलो की भयंकर गर्जनाए सुनाई देने लगती है. झंझावात वायु बहने लगती है. बिजलीया कड़कने लगती है.

आसमान से ओले गिरने लगते है. ग्रामस्थ, पशु-पक्षी और मवेशी सभी भयग्रस्त हो जाते है. इसके बाद मुसलाधार वर्षा भी होने लगती है. चारों और पानी ही पानी हो जाता है. खलिहानों में रखा अनाज गीला हो जाता है.  पशुओ के लिए रखे चारे के ढेर के ढेर पानी में बह जाते है.

गरीब और निराश्रित लोग और अन्य ग्रामस्थ लोग सब द्वारकामाई में शरण लेने आते है.

शिर्डी के कुछ लोग अनेक छोटे और बड़े देवताओ से मन्नत माँगते है, पर किसी भी देवता से कोई भी राहत नहीं मिलती है.

फिर शिर्डी के रहिवासी  इस संकट से बचने के लिए साईबाबा से गुहार लगाते है. साईबाबा को न तो कोई चढ़ावा चढ़ाना पड़ता था न कोई यज्ञयाग या पशुबलि जैसा कर्मकांड लगता था. साईबाबा तो केवल भाव के भूखे थे, केवल निवेदन से हो लोगो के संकट हर लेते थे.

लोगो को ऐसा भयभीत देखकर साईबाबा बहुत ही व्यथित हो जाते है. साईबाबा अपनी गद्दी छोड़कर द्वारकामाई के प्रवेश द्वार से बाहर बारिश में निकल आते है. उनके ऊपर बदल गरज रहे होते है, बिजलीया कड़कती रहती है.

साईबाबा जोर-जोर से गर्जना करते है. वातावरण में उनका नाद गूंजने लगता है. उनके स्वर से द्वारकामाई मानों`कम्पित होने लगती है. आखिर बाबा की इस गर्जना से बारिश धीरे-धीरे कम होने लगती है.

बवंडर जैसी हवाये रुक जाती है, बादल छट जाते है और चंद्रम और तारे दिखने लगते है. सभी लोग अपने-अपने घरो को जाते है, पशु-पक्षी भी निर्भय हो जाते है. शिर्डी पर आया दैवीय संकट साईबाबा की कृपा से टल जाता है.

ऐसी ही एक अन्य घटना है. एक बार दोपहर के समय द्वारकामई मे धुनी की आग एकदम से भडक कर छ को छुने लगती है. लोगो को लगता है कि द्वारकामाई कर भस्म हो जएगी.

सभी लोग चिंताग्रस्त होते है, पर बाबा निश्चिंत बैठे रहते है. कोई धुनी मे पानी डालने का सुझाव देता है पर साईबाबा के भय से कोई ऐसा कर नही पाता है.

आखिर में साईबाब अपना सटका (बड़ा डंडा) उठकर एक तख्त पार मरते हुवे कहते है :-“ पीछे हट ..”. फिर धुनी के पास के एक खम्बे पर “सबूर सबूर” कहते हुवे के का प्रहार करने लगते है.अग्नि की ज्वाला धीरे-धीरे शांत हो जाती है.

साईबाबा की पांच महाभूतो पर सत्ता थी.  ये दोनों प्रसंग साईसच्चरित के 11 वे अध्याय मे आये है, जो इस अध्याय का पाठ करेगा सकी आपदा का निरसन होगा. ऐसा साईसच्चरित मे स्पष्ट उल्लेख हैं.

साईसच्चरित के रचनाकार हेमाडपंतजी आगे कहते है:- “ जो भक्त शुद्ध ह्रदय से नियमनिष्ठ होकर साईबाबा की भक्ति करेगा उसकी सारी कामनाये पूरी होकर अंत में निष्काम होकर वह सायुज्य मुक्ति को प्राप्त होगा.

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