Tuesday, October 13, 2020

साईलीला बोधामृत # 12 भगवान कैसे प्रसन्न होते है ?

 दोपहर का वक्त था. शिर्डी में रहते हुवे श्रीमती तर्खड भोजन परोसने के लिए थालिया लगाती है. तभी उनके दरवाजे के पास एक भूखा श्वान (कुत्ता )आ जाता है. श्रीमती तर्खड उस श्वान को थाली में परोसी भाकरी (मोटे अनाज से बनी रोटी ) का एक-चौथाई हिस्सा दे देती है. उसके बाद वहां एक कीचड़ से सना शूकर आता है, श्रीमती तर्खड उसे भी भाकरी खिला देती है.

यह साधारण सी बात श्रीमती तर्खड के ध्यान से उतर जाती है. भोजन करने के बाद श्रीमती तर्खड जब द्वारकामाई जाती है तब साईबाबा स्वयं होकर श्रीमती तर्खड से कहते है:-“ माई, आज आपने मुझे पेटभर भोजन करा दिया. भूख से मेरे प्राण व्याकुल हो गए थे पर आपने भोजन देकर मुझे तृप्त कर दिया. आगे भी हमेशा ऐसे ही मुझ पर कृपा करना. यही कार्य आपके काम आएगा. इस द्वारकामाई मस्जिद में बैठकर मैं सत्य वचन कह रहा हुँ. पहले भूखों को भोजन दो फिर स्वयं भोजन ग्रहण करो. इस बात को सदैव ध्यान में रखना.”

यह बात श्रीमती तर्खड को समझ में नहीं आती है, पर वह जानती थी कि साईबाबा की वाणी तो कभी निरर्थक हो ही नहीं सकती है.

वे कहती है:- “ बाबा, यहाँ शिर्डी में तो हम परतंत्र से है. पैसो से भोजन का क्रय करते है. जिस दिन जो भोजन मिलता है, वही हम ग्रहण करते है.”

इस पर साईबाबा कहते है:- “प्रेम की वह भाकर खाकर मैं तृप्त हो गया हुँ, मुझे अभी भी डकार आ रही है. भोजन करने से पहले आपने जिन श्वान और शूकर को भोजन दिया, उनसे मेरी एकात्मता है.”

यह सुनकर श्रीमती तर्खड आश्चर्य चकित रह जाती है.

साईबाबा आगे कहते है:- “ श्वान, शूकर, गाय, बिल्ली, चींटी, मक्खी,जलचर इत्यादि प्राणियों में मैं ही विचरण कर रहा हुँ.  जो सभी जीवो में मुझे देखेगा वही मेरे प्रेम को प्राप्त होगा. आप भेदबुद्धि  का त्याग कर ऐसे ही मुझे भजा करो.”

 

ठीक यही बात गीताजी में भी कही गई है कि भगवान सभी जीवो के ह्रदय में रहते है. (अध्याय १८ श्लोक ६१ )

उस समय साईबाबा के मुख से परब्रह्म ही बोल रहा था, ठीक उसी तरह जिस तरह भगवान श्रीकृष्ण के मुख से गीता कही गई थी.

यज्ञ क्या होताहै ? अग्नि जो कि देवतओं का मुख है,उसमें आहुतियों का डालना ! अगर हम किसी भूखे जीव चाहे वह मनुष्य हो या पशु या फिर पक्षी को अगर अन्न या जल देते है तो वह यज्ञ ही होगा. क्योंकि तब हम उसकी जठराग्नि में आहुतियाँ डाल रहे होते है.

भगवान स्वयं जीवो में जठराग्नि के रूप में रहता है (गीताजी अध्याय १५ श्लोक १४)

कलियुग में जब अनेक मनुष्य, गोमाता व अन्य पशु-पक्षी सभी अपनी क्षुधाग्नि से जलते हुवे दर-दर ठोकरें खा रहे है, उस समय अन्नदानरूपी यज्ञ का करना ही श्रेष्ठतम होगा और इसी से परमात्मा प्रसन्न होंगे.

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home