Tuesday, October 13, 2020

साईलीला बोधामृत # 11 साईबाबा का सूक्ष्म देह से अपने भक्तों के घर जाना

 बाबासाहेब तर्खड एक मिल में उच्च अधिकारी थे. उनकी तरह उनका पुत्र भी अनन्य साईभक्त था. वह रोज सुबह उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर काया, वाचा और मन से साईभक्ति करता था. साईबाबा को नेवैद्य अर्पित किये बिना तो वह भोजन तक नहीं करता था. बाबासाहेब की पत्नी भी साईबाबा की परम भक्त थी. एक बार धर्मपत्नी की इच्छा शिर्डी जाने की होती है. बाबासाहेब चाहते थे कि उनका पुत्र भी उसकी माता के साथ शिर्डी जाये ताकि उसकी माताजी की यात्रा में देखरेख हो सके और यात्रा भी सुगमता से परिपूर्ण हो जाए. लेकिन तर्खडजी का पुत्र घर छोड़कर कही भी जाने को तैयार नहीं था, क्योंकि इससे उसके साईबाबा को नित्य नेवैद्य अर्पण करने के नियम में खंड पड़ता.

तर्खडजी प्रार्थना समाज के सदस्य थे. प्रार्थनासमाज ईश्वर की निर्गुण भक्ति पर जोर देता था और प्रार्थना समाज मूर्तिपूजा या तस्वीर के पूजन को सही नहीं मानता था. इसीलिए तर्खडजी का पुत्र अपने पिता को साईबाबा को नेवैद्य अर्पित करने के बारे में कैसे कह सकता था ?

पर साईबाबा के प्रति भक्तिभाव के चलते तर्खडजी साईबाबा के चित्र को नेवैद्य अर्पित करने की  जवाबदारी उठा लेते है. ‘साईबाबा को नेवैद्य अर्पण किये बिना घर में कोई भी अन्नग्रहण नहीं करेगा’- ऐसा अभिवचन भी देते है.

इससे उनका पुत्र संतुष्ट होकर अपनी माता के साथ शिर्डी के लिए प्रस्थान कर देता  है. तर्खडजी  को प्रतिदिन मिल में सुबह-सुबह जाना पडता था.

तर्खडजी प्रतिदिन प्रातकाल में साईबाबा का पूजन करके नेवैद्य अर्पण करते थे. मिल से लौटकर वे साईबाबा को अर्पित शक्कर के नेवैद्य से अन्नशुद्धि कर के भोजन ग्रहण करते थे. कुछ दिनों तक यह क्रम निर्बाध रूप से चलता है. पर एक दिन मिल से लौटकर भोजन करते समय जब उनकी रोटीवाली बाई ने थाली में शक्कर नहीं रखी, तब उन्हें यह ध्यान होता है कि वे आज साईबाबा को नेवैद्य अर्पित करना भूल गए है.

तर्खडजी का मन अनुताप से भर जाता है. वे साईबाबा के चित्र को सजल नेत्रों से दंडवत करके अपने सेवापराध की क्षमा माँगते है. साथ ही वे अपने हातों से घटित इस सेवापराध का उल्लेख करते हुवे शिर्डी में अपने पुत्र को एक पत्र लिखते है. वे उस पत्र में अपने पुत्र को साईबाबा से उनके अपराध को क्षमा करने की प्रार्थना करने को कहते है.

यह घटना बांद्रा में घटी थी जो कि शिर्डी से तकरीबन २५० किलोमीटर की दुरी पर है. उसी समय शिर्डी में उनका पुत्र और धर्मपत्नी, द्वारकामाई में आकर साईबाबा के चरणों का वंदन करते है.

तब साईबाबा श्रीमती तर्खड से कहते है:- “ माँ.., मैं आज भी प्रतिदिन की तरह बांद्रा गया था. वहां किवाड़ बंद थे, फिर भी मै अन्दर चला गया, पर मुझे वहां नेवैद्य नहीं मिला और भूखा ही भरी दोपहरी में लौटना पड़ा .”

यह सुनते ही तर्खडजी के पुत्र की समझ में आ जाता है कि जरुर उनके पिता के द्वारा नेवैद्य अर्पित करने में कोई त्रुटी हुई है. इस पूरी घटना का उल्लेख करते हुवे तर्खडजी का पुत्र अपने पिता को बान्द्रा में पत्र भेजता है. यह पत्र पढ़कर तर्खडजी के नेत्र सजल हो जाते है.

उधर बांद्रा से भेजा हुवा उनका पत्र भी उनके परिवार को मिलता है. तर्खडजी का पुत्र साईबाबा की सर्वज्ञता और सर्वसत्ता के आगे नतमस्तक हो जाता है. साईबाबा स्थूलदेह से शिर्डी में होने पर भी पुरे विश्व में कही भी उनकी सूक्ष्म देह के द्वारा आ-जा सकते थे.

इसीलिए साईबाबा के चमत्कारों का अनुभव शिर्डी के बाहर भी उनके भक्तों को होता रहता था. आज भी साईबाबा अपनी सूक्ष्मदेह से उनके भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते रहते है. साईबाबा की कृपा केवल शिर्डी में ही नहीं वरन इस धरा पर कही पर भी प्राप्त की जा सकती है, केवल ह्रदय में उत्कट साईभक्ति होनी चाहिए.

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